July 4, 2008
रचना: कैफ़ी आज़मी
स्वर: भूपिन्दर, रफ़ी, तलत महमूद और मन्ना डे
होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा
दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क़ आँखों ने पिये और न बहाए होंगे
बन्द कमरे में जो खत मेरे जलाए होंगे
एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा
उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा
छेड़ की बात पे अरमाँ मचल आए होंगे
ग़म दिखावे की हँसी में उबल आए होंगे
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा
ज़ुल्फ़ ज़िद करके किसी ने जो बनाई होगी
और भी ग़म की घटा मुखड़े पे छाई होगी
बिजली नज़रों ने कई दिन न गिराई होगी
रँग चहरे पे कई रोज़ न आया होगा
यह गीत जितनी बार भी सुनो दिल को छू जाता है। आज तक शायद ही कभी इसे सुनकर मेरी आँखें न भरी हों।
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कला और संगीत, मन्ना डे, मोहम्मद रफ़ी |
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Posted by अंकुर वर्मा
June 18, 2008
स्वर: मन्ना डे
उद्धृत: http://aksharavanam.blogspot.com/2008/03/blog-post_1820.html
चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया
उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया
बरफ़ी के सब रस ले लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया
उड़ उड़ बैठी बजजवा दुकनिया
कपड़ा के सब रस ले लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया
उड़ उड़ बैठी पनवड़िया दुकनिया – २
बीड़ा के सब रस ले लियो रे पिंजड़े वाली मुनिया
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कला और संगीत, मन्ना डे |
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Posted by अंकुर वर्मा
June 17, 2008
रचना: साहिर लुधियानवी
स्वर: मन्ना डे
लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे
चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे घर जाऊँ कैसे
हो गयी मैली मोरी चुनरिया कोरे बदन सी कोरी चुनरिया
जाके बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे घर जाऊँ कैसे
भूल गयी सब वचन विदा के खो गयी मैं ससुराल में आ के
जाके बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे घर जाऊँ कैसे
कोरी चुनरिया आत्मा मोरी मैल है मायाजाल
वो दुनिया मोरे बाबुल का घर ये दुनिया ससुराल
जाके बाबुल से नजरें मिलाऊँ कैसे घर जाऊँ कैसे
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कला और संगीत, मन्ना डे |
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Posted by अंकुर वर्मा