अभी तो मैं जवान हूँ …
January 27, 2008रचना: हफ़ीज़ जालंधरी
स्वर: मलिका पुखराज
लिपिबद्ध संस्करण (मूलस्रोत : बीबीसी हिन्दी)
अभी तो मैं जवान हूँ (3)
हवा भी ख़ुशगवार है, गुलों पे भी निखार है
तरन्नुमें हज़ार हैं, बहार पुरबहार है
कहाँ चला है साक़िया, इधर तो लौट इधर तो आ
अरे, यह देखता है क्या? उठा सुबू, सुबू उठा
सुबू उठा, पयाला भर पयाला भर के दे इधर
चमन की सिम्त कर नज़र, समा तो देख बेख़बर
वो काली-काली बदलियाँ , उफ़क़ पे हो गई अयाँ
वो इक हजूम-ए-मैकशाँ, है सू-ए-मैकदा रवाँ
ये क्या गुमाँ है बदगुमाँ, समझ न मुझको नातवाँ
ख़याल-ए-ज़ोह्द अभी कहाँ? अभी तो मैं जवान हूँ (3)
इबादतों का ज़िक्र है, निजात की भी फ़िक्र है
जनून है सबाब का, ख़याल है अज़ाब का
मगर सुनो तो शेख़ जी, अजीब शय हैं आप भी
भला शबाब-ओ-आशिक़ी, अलग हुए भी हैं कभी
हसीन जलवारेज़ हो, अदाएं फ़ितनाख़ेज़ हो
हवाएं इत्रबेज़ हों, तो शौक़ क्यूँ न तेज़ हो?
निगारहा-ए-फ़ितनागर , कोई इधर कोई उधर
उभारते हो ऐश पर, तो क्या करे कोई बशर
चलो जी क़िस्सा मुख़्तसर, तुम्हारा नुक़्ता-ए-नज़र
दरुस्त है तो हो मगर, अभी तो मैं जवान हूँ (3)न ग़म कशोद-ओ-बस्त का, बुलंद का न पस्त का
न बूद का न हस्त का, न वादा-ए-अलस्त का (2)
उम्मीद और यास गुम, हवास गुम क़यास गुम
नज़र से आस-पास गुम, हमां बजुज़ गिलास गुम
न मय में कुछ कमी रहे, कदा से हमदमी रहे
निशस्त ये जमी रहे, यही हमा-हमीं रहे
वो राग छेड़ मुतरिबा (2), तरवफ़िज़ा आलमरुबा
असर सदा-ए-साज़ का, जिग़र में आग दे लगा (3)
हर इक लब पे हो सदा, न हाथ रोक साक़िया
पिलाए जा पिलाए जा, पिलाए जा पिलाए जाअभी तो मैं जवान हूँ (3)
ये ग़श्त कोहसार की, ये सैर जू-ए-वार की
ये बुलबुलों के चहचहे, ये गुलरुख़ों के क़हक़हे
किसी से मेल हो गया, तो रंज-ओ-फ़िक्र खो गया
कभी जो वक़्त सो गया, ये हँस गया वो रो गया
ये इश्क़ की कहानियाँ, ये रस भरी जवानियाँ
उधर से महरबानियाँ, इधर से लन्तरानियाँ
ये आस्मान ये ज़मीं (2), नज़्ज़राहा-ए-दिलनशीं
उने हयात आफ़रीं, भला मैं छोड़ दूँ यहीं
है मौत इस क़दर बरीं, मुझे न आएगा यक़ीं
नहीं-नहीं अभी नहीं, नहीं-नहीं अभी नहींअभी तो मैं जवान हूँ (3)
ध्वनि संस्करण
यू-ट्यूब पर उपलब्ध यह वीडियो एक टीवी रिकार्डिंग है जिसमें मलिका पुखराज के साथ उनकी बेटी ताहिरा सईद ने भी अपनी आवाज दी है।
मलिका पुखराज का अतिसंक्षिप्त जीवनवृत्त (मुख्य स्रोत: विकीपीडिया)
मलिका पुखराज का जन्म १९१२ में जम्मू के निकट हुआ। आठ वर्ष की आयु में ही वह जम्मू के राजा हरि सिंह के दरबार में सम्मिलित हो गयीं। संगीत शिक्षा उन्होनें उस्ताद अल्लाह बख़्श (बड़े गुलाम अली ख़ान के पिता) से ली। उनका विवाह लाहौर में सईद शब्बीर हुसैन शाह से हुआ और उन्होंने चार बेटों और दो बेटियों को जन्म दिया। उनकी एक बेटी ताहिरा सईद भी एक सुप्रसिद्ध गायिका के रूप में सामने आयीं। आठ दशकों तक अपनी ठुमरी, ग़ज़ल, भजन और पहाड़ी लोकगीतों से सबके दिलों पर राज करने के बाद २००४ में लम्बी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।
Posted by अंकुर वर्मा