यहाँ तंगी-ए-क़फ़स है

June 3, 2008

रचना: क़मर जलालवी
स्वर: मुन्नी बेग़म

यहाँ तंगी-ए-क़फ़स है वहाँ फ़िक्र-ए-आशियाना
न यहाँ मेरा ठिकाना न वहाँ मेरा ठिकाना

न फूल हैं चमन में न शाख़-ए-आशियाना
फ़क़त एक बर्क़ चमके के बदल गया ज़माना

मेरे सामने चमन का न फ़साना छेड़ हमदम
मुझे याद आ न जाये कहीं अपना आशियाना

‘क़मर’ अपने दाग़-ए-दिल की वो कहानी मैनें छेड़ी
फ़ितना किये सितारे मेरा रात भर फ़साना


पसीने पसीने हुये जा रहे हो

May 18, 2008

रचना: सईद राही
स्वर: मुन्नी बेग़म

पसीने पसीने हुये जा रहे हो
ये बोलो कहाँ से चले आ रहे हो

हमें सब्र करने को कह तो रहे हो
मगर देख लो ख़ुद ही घबरा रहे हो

ये किसकी बुरी तुमको नज़र लग गयी है
बहारों के मौसम में मुरझा रहे हो

ये आईना है ये तो सच ही कहेगा
क्यों अपनी हक़ीक़त से कतरा रहे हो


हुआ ज़माना के उसने हमको

May 17, 2008

स्वर: मुन्नी बेग़म

हुआ ज़माना के उसने हमको न भूल कर भी सलाम भेजा
मिज़ाज पूछा न हाल लिखा न ख़त न कोई पयाम भेजा

नहीं है तौबा का ऐतबार अब नहीं है अब दिल पे इख़्तियार अब
बुला रही है हमें बहार अब घटाओं ने भी पयाम भेजा

ये बेबसी कैसी बेबसी है के रह सके वो न ताबा आख़िर
निगाह-ए-ग़म ही ने ताबा आख़िर पयाम-ए-शौक़-ए-तमाम भेजा

बहार-ए-उम्मीद छा रही है बहश्त-ए-दिल लहलहा रही है
ये फूल क्यों उसने ख़त में रखकर हमें बयीं एहतमाम भेजा


नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं

May 16, 2008

रचना: नासिर काज़मी
स्वर: मुन्नी बेग़म / ग़ुलाम अली

नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं
तू भी दिल से उतर न जाय कहीं

आज देखा है तुझको देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाय कहीं

आरज़ू है कि तू यहाँ आये
और फ़िर उम्र भर न जाय कहीं

दिल जलाता हूँ और सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाय कहीं

न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाय कहीं

आओ कुछ देर रो ही लें ‘नासिर’
फिर ये दरिया उतर न जाय कहीं

मुन्नी बेग़म

ग़ुलाम अली


मरीज़-ए-मोहब्बत उन्हीं का फ़साना

March 17, 2008

रचना: क़मर जलालवी
स्वर: मुन्नी बेग़म

मरीज़-ए-मोहब्बत उन्हीं का फ़साना
सुनाता रहा दम निकलते निकलते
मगर ज़िक्र-ए-शाम-ए-अलम जब भी आया
चिराग़-ए-सहर बुझ गया जलते जलते

इरादा था तर्क-ए-मुहब्बत का लेकिन
फ़रेब-ए-तबस्सुम में फिर आ गये हम
अभी खाके ठोकर सम्भलने न पाये
कि फिर खाई ठोकर सम्भलते सम्भलते

उन्हें ख़त में लिखा था दिल मुज़्तरिब है
जवाब उन का आया मुहब्बत न करते
तुम्हें दिल लगाने को किसने कहा था
बहल जायेगा दिल बहलते बहलते

अरे कोई वादा ख़िलाफ़ी की हद है
हिसाब अपने दिल में लगाकर तो देखो
क़यामत का दिन आ गया रफ़्ता रफ़्ता
मुलाक़ात का दिन बदलते बदलते

हमें अपने दिल की तो परवाह नहीं है
मगर डर रहा हूँ ये कमसिन की ज़िद है
कहीं पा-ए-नाज़ुक में मोच आ न जाय
दिल-ए-साक-ए-जाँ को मसलते मसलते

वो मेहमाँ रहे भी तो कब तक हमारे
हुयी शम्मा गुल और डूबे सितारे
‘क़मर’ इस क़दर उन को जल्दी थी घर की
वो घर चल दिये चाँदनी ढलते ढलते