स्वर:मेंहदी हसन
रचना: बहादुर शाह ज़फ़र
लागी रे लागी लगन ये ही दिल में
June 2, 2008स्वर: मेहदी हसन
लागी रे लागी लगन ये ही दिल में
दीप जले सुर के सागर में जब मैं गीत सुनाऊँ
लागी रे…
सरगम छेड़ूँ बरखा वर से जलती आग बुझाऊँ रे
लागी लगन…
नील गगन की परियाँ नाचें जब मैं तान लगाऊँ रे
लागी लगन…
दूर हों सारे दुःख अँधियारे प्यार की जोत जगाऊँ रे
लागी लगन…
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
May 13, 2008रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: मेंहदी हसन / बेग़म अख़्तर / नूरजहाँ
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के
इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दिगार के
दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के
भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वल-वले दैल-ए-ना-कर्दाकार के
मेंहदी हसन
बेग़म अख़्तर
नूरजहाँ
मोहब्बत करनेवाले कम न होंगे
April 3, 2008रचना: हफ़ीज़ होशियारपुरी
स्वर: मेहदी हसन
मोहब्बत करनेवाले कम न होंगे
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे
ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे
दिलों की उलझनें बढ़ती रहेंगी
अगर कुछ मश्वरे बाहम न होंगे
(बाहम == आपस में)
अगर तू इत्तफ़ाक़न मिल भी जाये
तेरी फ़ुर्क़त के सदमें कम न होंगे
(फ़ुर्क़त == जुदाई)
‘हफ़ीज़’ उन से मैं जितना बदगुमाँ हूँ
वो मुझ से इस क़दर बर्हम न होंगे
(बदगुमाँ == शक करना, बर्हम == नाराज़)
मैं ख़याल हूँ किसी और का
February 21, 2008रचना: सलीम कौसर
स्वर: मेहदी हसन
मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मेरा अक्स है पस-ए-आइना कोई और है
मैं किसी के दस्त-ए-तलब में हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ
मैं नसीब हूँ किसी और का मुझे माँगता कोई और है
कभी लौट आयें तो न पूछना सिर्फ़ देखना बड़े ग़ौर से
जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है
अजब ऐतबार-ब-ऐतबारी के दर्मियाँ है ज़िन्दगी
मैं क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है
वही मुन्सिफ़ों की रिवायतें वही फ़ैसलों की की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोईऔरथा पर मेरी सज़ा कोई और है
तेरी रोशनी मेरी ख़द्दो-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर
तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है
तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं
तेरी दास्ताँ कोई और थी मेरा वाक़याँ कोई और है
जो मेरी रियाज़त-ए-नीमशब को “सलीम” सुबह न मिल सकी
तो फिर इस के माने तो ये हुए के यहाँ ख़ुदा कोई और है
यू-ट्यूब वीडियो:
पहला भाग (6:00 मिनट)
दूसरा भाग (4:54 मिनट)
Posted by अंकुर वर्मा
Posted by अंकुर वर्मा
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