शमशीर बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी है
जूड़े की गुंधावट बहर-ए-ख़ुदा ज़ुल्फ़ों की लटक फिर वैसी है
(शमशीर== तलवार, बरहना == नंगी/खाली, बहर-ए-ख़ुदा == ख़ुदा के लिये)
हर बात में उसकी गर्मी है हर नाज़ में उस के शोख़ी है
आमद है क़यामत चाल भरी चलने की फड़क फिर वैसी है
(आमद == आना, पहुँचना)
महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट
जाली की ये कुरती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी है
(महरम == जान पहचान, हबाब == बुलबुला, आब-ए-रवाँ == बहता हुआ पानी)
वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल
नाच उसका उठाये सौ फ़ितने घुंघरू की छनक फिर वैसी है
(फ़ितने == दंगे/फ़साद)
रचना: नवाब बहादुर शाह ज़फ़र
स्वर: मोहम्मद रफ़ी/हबीब वली मोहम्मद
न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सका, मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
(ग़ुबार == धूल)
न किसी की आँख का नूर हूँ…
न तो मैं किसी का हबीब हूँ, न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ
(हबीब == प्यारा/ दोस्त, रक़ीब == दुश्मन, दयार == शहर)
न किसी की आँख का नूर हूँ…
मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया, मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
न किसी की आँख का नूर हूँ…
पये फ़ातेहा कोई आये क्यों, कोई चार फूल चढ़ाये क्यों
‘ज़फ़र’ अश्क कोई बहाये क्यों, मैं वो बेक़सी का मज़ार हूँ
(बेक़सी == मजबूरी)
न किसी की आँख का नूर हूँ…
मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ, मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा, किसी दिलजले की पुकार हूँ
(जाँफ़िशाँ == कड़ी मेहनत)
कब मेरा नशेमन एहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं
ग़ुन्चे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं
(एहल-ए-चमन == चमन में रहने वाले, गवारा == झेलना/भुगतना)
पूछो न अरक़ रुख़सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो
सुनते हैं के शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं
(अरक़ == भीगे/ रसीले, रुख़सार == चेहरा, गाल)
जाती हुई मय्यत देख के भी अल्लाह तुम उठ कर आ न सके
दो चार क़दम तो दुश्मन भी तक़लीफ़ गवारा करते हैं
अब नज़ा का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो
जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं
(नज़ा == अनबन, लड़ाई)
तारों की बहारों में भी ‘क़मर’ तुम अब सुरदास से रहते हो
फूलों को तो देखो काँटों में हँस हँस के गुज़ारा करते हैं