शमशीर बरहना माँग ग़ज़ब

February 16, 2008

रचना: नवाब बहादुर शाह ज़फ़र
स्वर: हबीब वली मोहम्मद

शमशीर बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी है
जूड़े की गुंधावट बहर-ए-ख़ुदा ज़ुल्फ़ों की लटक फिर वैसी है
(शमशीर== तलवार, बरहना == नंगी/खाली, बहर-ए-ख़ुदा == ख़ुदा के लिये)

हर बात में उसकी गर्मी है हर नाज़ में उस के शोख़ी है
आमद है क़यामत चाल भरी चलने की फड़क फिर वैसी है
(आमद == आना, पहुँचना)

महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट
जाली की ये कुरती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी है
(महरम == जान पहचान, हबाब == बुलबुला, आब-ए-रवाँ == बहता हुआ पानी)

वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल
नाच उसका उठाये सौ फ़ितने घुंघरू की छनक फिर वैसी है
(फ़ितने == दंगे/फ़साद)


श्याम बेनेगल की फ़िल्म मण्डी (1983) से


न किसी की आँख का नूर हूँ

February 15, 2008

रचना: नवाब बहादुर शाह ज़फ़र
स्वर: मोहम्मद रफ़ी/हबीब वली मोहम्मद

न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सका, मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
(ग़ुबार == धूल)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

न तो मैं किसी का हबीब हूँ, न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ
(हबीब == प्यारा/ दोस्त, रक़ीब == दुश्मन, दयार == शहर)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया, मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

न किसी की आँख का नूर हूँ…

पये फ़ातेहा कोई आये क्यों, कोई चार फूल चढ़ाये क्यों
‘ज़फ़र’ अश्क कोई बहाये क्यों, मैं वो बेक़सी का मज़ार हूँ
(बेक़सी == मजबूरी)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ, मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा, किसी दिलजले की पुकार हूँ
(जाँफ़िशाँ == कड़ी मेहनत)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

यू-ट्यूब वीडियो:
मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में

हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में


लगता नहीं है दिल मेरा

February 13, 2008

शायर: नवाब बहादुर शाह ज़फ़र
स्वर: हबीब वली मोहम्मद

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलम-ए-नापायदार में
(दयार == शहर, आलम-ए-नापायदार == नश्वर जगत)

कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
(उम्र-ए-दराज़ == लम्बी उम्र)

बुलबुल को बागबाँ से न सय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़सल-ए-बहार में
(फ़सल-ए-बहार == बहार का मौसम)

कितना है बदनसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
(कू-ए-यार == यार की गली)

एक महफ़िल का वीडियो यू-ट्यूब पर

इस वीडियो की शुरुआत में हबीब वली मोहम्मद ने अपना एक संक्षिप्त परिचय भी दिया है।
ज़रीना बेग़म की आवाज़ में


कब मेरा नशेमन एहल-ए-चमन

February 12, 2008

रचना: क़मर जलालवी
स्वर: हबीब वली मोहम्मद

कब मेरा नशेमन एहल-ए-चमन गुलशन में गवारा करते हैं
ग़ुन्चे अपनी आवाज़ों में बिजली को पुकारा करते हैं
(एहल-ए-चमन == चमन में रहने वाले, गवारा == झेलना/भुगतना)

पूछो न अरक़ रुख़सारों से रंगीनी-ए-हुस्न को बढ़ने दो
सुनते हैं के शबनम के क़तरे फूलों को निखारा करते हैं
(अरक़ == भीगे/ रसीले, रुख़सार == चेहरा, गाल)

जाती हुई मय्यत देख के भी अल्लाह तुम उठ कर आ न सके
दो चार क़दम तो दुश्मन भी तक़लीफ़ गवारा करते हैं

अब नज़ा का आलम है मुझ पर तुम अपनी मोहब्बत वापस लो
जब कश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं
(नज़ा == अनबन, लड़ाई)

तारों की बहारों में भी ‘क़मर’ तुम अब सुरदास से रहते हो
फूलों को तो देखो काँटों में हँस हँस के गुज़ारा करते हैं