तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था

June 6, 2008

रचना: दाग़ दहलवी
स्वर: ग़ुलाम अली

ख़त दीजिये छुपाके मिले वो अगर कहीं
लेना न मेरे नाम को ऐ नामबर कहीं

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किसका था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किसका था

वफ़ा करेंगे निभायेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किसका था

न पूछ-पाछ थी किसी की न आव भगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किसका था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किये पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बादिल वो पयाम किसका था

इन्हीं सिफ़त से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किससे कहें
ख़याल दिल को मेरे सुबह-ओ-शाम किसका था

हर एक से कहते हैं क्या ‘दाग़’ बेवफ़ा निकला
ये पूछे इन से कोई वो ग़ुलाम किसका था


नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं

May 16, 2008

रचना: नासिर काज़मी
स्वर: मुन्नी बेग़म / ग़ुलाम अली

नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं
तू भी दिल से उतर न जाय कहीं

आज देखा है तुझको देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाय कहीं

आरज़ू है कि तू यहाँ आये
और फ़िर उम्र भर न जाय कहीं

दिल जलाता हूँ और सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाय कहीं

न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाय कहीं

आओ कुछ देर रो ही लें ‘नासिर’
फिर ये दरिया उतर न जाय कहीं

मुन्नी बेग़म

ग़ुलाम अली


बेचैन बहुत फिरना

April 8, 2008

रचना: मुनीर नियाज़ी
स्वर: ग़ुलाम अली

बेचैन बहुत फिरना घबराये हुए रहना
इक आग सी जज़बों की बहकाये हुए रहना

छलकाये हुए चलना ख़ुश्बू लब-ए-लाली की
इक बाग़ सा साथ अपने महकाये हुए रहना

उस हुस्न का शेवा है जब इश्क़ नज़र आये
पर्दे में चले जाना शर्माये हुए रहना

इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से
इक चाँद सा आँखों में चमकाये हुए रहना

आदत ही बना ली है तुम ने तो ‘मुनीर’ अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताये हुए रहना


हंगामा है क्यों बरपा

April 7, 2008

रचना: अक़बर इलाहाबादी
स्वर: ग़ुलाम अली

अंदाज़ अपने देखते हैं आइने में वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता न हो

गिर पड़ा जाम यूँ हुआ महसूस
उनकी आँखों ने बद्दुआ दी है

हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाक़ा तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है

नातजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है

उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेग़ाना
मक़सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है

मैं तेरी मस्ती गाही का धरम रख लूँगा
होश आया भी तो कह दूँगा कि मुझे होश नहीं

वाँ दिल में कि सदमे दो याँ जी में के सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहे काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है


चमकते चाँद को टूटा हुआ

February 7, 2008

स्वर: ग़ुलाम अली
गीतकार: आनन्द बख्शी
फ़िल्म: आवारगी

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहाँ सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला

चमकते चाँद को…

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