रचना: सरूर बाराबंकवी
स्वर: फ़िरदौसी बेग़म
फ़िल्म: नवाब सिराजुद्दौला
है ये आलम तुझे भुलाने में, अश्क आते हैं मुस्कुराने में
एक सूरत भी आशना सी नहीं, इतनी तनहा हूँ मैं जमाने में
वो मेरे ख़ून-ए-आरज़ू से सही, रंग तो आ गया फ़साने में
कितनी सुनसान है चमन की फ़िज़ा, दिल धड़कता है आशियाने में
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Posted by अंकुर वर्मा