बस यूँ ही…

April 14, 2008

एक अरसा हो गया है कुछ लिखे हुये, किसी की निंदा किये। यह सोचकर मन को बहला रहे थे कि आजकल व्यस्तता कुछ अधिक रहने लगी है। पर कारण शायद विषयाभाव था। आज प्रातः अनूप जी मिलने आये, शायद उससे कुछ प्रेरणा मिली होगी और फिर शाम को अकेले कानपुर शहर जाना पड़ा। दो घंटे की इस कष्टदायी यात्रा ने समय दिया विचार मंथन का और एक दो विचार जो मन में आये वही लिख रहा हूँ। पहली बात जिसे विचार के बजाय यदि अवलोकन कहा जाय तो अधिक उचित होगा। आज हमारे संविधान लेखन समिति के प्रमुख डॉ भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिवस था जोकि पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मनाया जा रहा है। यदि आपको राष्ट्रीय अवकाश की गुरुता सही से समझ न आ रही हो तो जान लीजिये कि आज मदिरा निषिद्ध दिन (ड्राई डे) है, अब शायद आपको इसकी गुरुता समझ आ गयी होगी। चलिये इसी बहाने आज के दिन कुछ बुराइयाँ शायद कम हों या फिर अगर कालाबाजारी को भी एक बुराई माना जाय तो बाकी कुछ बुराइयाँ ज्यादा हों। ये ड्राई डे का फ़ंडा तो मेरी आज तक समझ नहीं आया। आपकी एक सोच होती है, कोई चीज बुरी है या फिर काम चालाऊ है पर कोई चीज किसी एक दिन के लिये अस्वीकार्य होना मेरी समझ से परे है। यही हाल मंगलवार या नवरात्रों में मांसाहार परहेजियों का है। यदि आप ईश्वर में विश्वास करते हैं तो कम से कम उसे मूर्ख तो नहीं समझना चाहिये। वैसे ऐसे लोगों के लिये ईश्वर का कुछ न बोलना एक वरदान सरीखा है, वह तो कभी बताता नहीं यहाँ आकर कि “वत्स तुम जो ये ढोंग करते हो क्या सोचते हो मेरी समझ नहीं आता”। बोलते हैं वे लोग जिनसे आप लोभ देकर अपनी मनपसंद और सुविधाजनक बात बुलवा सकते हैं। धर्म का उद्देश्य होना चाहिये समाज को बुराइयों से दूर रखना और शायद कभी रहा भी हो पर आज कदापि नहीं है। मेहदी हसन की गायी ग़ज़ल की एक पंक्ति याद आ रही है -

“ज़माने भर के ग़म और एक तेरा ग़म,
ये ग़म होता तो कितने ग़म न होते।”

चलिये पर आज के उत्सव सरीखे वातावरण को देख मन में एक उम्मीद जगी। स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और गाँधी जयन्ती जैसे राष्ट्रीय पर्व तो आजकल स्कूलों और सरकारी दफ़्तरों तक ही सीमित रह गये हैं या फिर कुछ ज्यादा ही अभद्रता से बोला जाय तो मजबूरी बन गये हैं। पर आज जिस तरह से आम जनता (या फिर कुछ लोग अगर इसे ख़ास जनता कहना चाहें) इसे मना रही थी यह समाजोत्थान का एक अच्छा संकेत हो सकता है यदि इसे राजनीति से दूर रखा जाय।

कल मैं कुछ समय के लिये एक सम्मेलन में भाग लेने के लिये शिमला जा रहा हूँ। कहने की कोई आवश्यकता तो नहीं है पर फिर भी यह सम्मेलन कम और देशाटन अधिक है। लौटकर कुछ अनुभव लिखूँगा यात्रा के बारे में और अपने विचारों के बारे में। यह लेख अपने आप में किसी तरह से भी पूर्ण नहीं है अतः आप अपनी टिप्पणियों से इसे पूरा करने में मेरी सहायता कर सकते हैं।


नैनो विज्ञान और तकनीक का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, आईकानसेट -२००८

March 1, 2008

आज चेन्नई ट्रेड सेंटर में तीन दिवसीय नैनो विज्ञान और तकनीक के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आईकानसेट -२००८ का सुखद समापन हो गया। सुखद इसलिए कि हमारे द्वारा प्रस्तुत पोस्टर को सर्वोत्तम आँका गया और १० हजार रुपये की पुरस्कार निधि से नवाज़ा गया। यह खुशी तब दो गुनी हो गयी जब इसके अतिरिक्त हमारे ग्रुप को नैनो विज्ञान के क्षेत्र में विलक्षण योगदान के लिए १० लाख रुपये कीमत का स्कैनिग टनलिंग माइक्रोस्कोप पुरस्कार स्वरूप दिया गया। यह सम्मेलन भारतीय वैज्ञानिक संस्थाओं के द्वारा दो वर्ष में एक बार आयोजित किया जाता है और लगभग कुम्भ के मेले के समान होता है। इस वर्ष इसमें करीब ३८ आमंत्रित व्याख्यानों के अतिरिक्त ३०० से अधिक पोस्टर प्रदर्शित किए गए। खैर चार-पाँच घंटे की गौरवानुभूति के बाद जब जब होश आया तो सोचा कि जबतक औरों को इसी प्रकार के पुरस्कार मिला करते थे तब यही सोचते थे कि सब पाखण्ड है और पहले से ही तय होता कि किसे सम्मानित करने में फ़ायदा है तो फ़िर आज क्या अलग हुआ। तुरंत दिमाग ने दिल को बहलाने वाला उत्तर दिया इस बार आयोजकों ने अपना कलंक मिटाने के लिए और अपने पुरस्कार की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए हम लोगों को चुना है। ठीक ही कहा है -

हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन,
दिल के ख़ुश रखने को ‘गालिब’ ये ख़याल अच्छा है |

बैग पर एयरलाइन्स का टैग

January 12, 2008

हमारे देश ने पिछले १०-१५ वर्षों में काफ़ी तरक्की की है। मुख्यतः सॉफ्टवेयर धूम के कारण देश के खासकर मध्यम वर्ग के लोगों में बहुत समृद्धि आयी है। पर इन सबके साथ आये सांस्कृतिक बदलाव और उसकी बदहजमी की झलक यहाँ-वहाँ देखने को मिल ही जाती है। अब सामान पर लगे एयरलाइन्स के टैग को ही ले लीजिये। यात्रा के बाद भी उसे न हटाया जाना किसी न किसी स्तर पर यह प्रयोक्ता की इस चेष्टा को उजागर करता है कि हाँ भाई लोगों हम भी हवाई जहाज की यात्रा कर चुके हैं। अपने मोबाइल को बिना वजह सार्वजनिक स्थान पर निकाल कर देखना, लघु संदेश पढ़ना भी कुछ इसी प्रकार का प्रयास है। यह सब एकदम ऐसा लगता है मानो आपने किसी १९ वीं सदी के गाँव से आये आदमी को नयी वी.आई.पी की चड्ढी दी हो और सबको दिखाने के उद्देश्य से उसने वह पतलून के ऊपर से पहन ली हो। या फ़िर रेलगाड़ी के वातानुकूलित डिब्बे में सफ़र करके अपने आप को बहुत परिष्कृत दिखाना, बोलना कि “ये स्लीपर कोच कितने गन्दे और अनकम्फ़र्टेबल होते हैं, पता नहीं लोग कैसे सफ़र करते हैं उसमें” जैसे खुद पहले कभी उसमें गये ही न हों। सम्पन्नता बुरी नहीं है, परन्तु उसे पाकर अपना अतीत, और सभ्यता भुला देना घातक सिद्ध हो सकता है।


वूमेन ऑन टॉप

November 29, 2007

अक्सर अंग्रेजी अखबारों में आपने देखा होगा कि किसी महिला के ऊंचे ओहदे तक पहुँचने की ख़बर को “वूमेन ऑन टॉप” शीर्षक के साथ छापा जाता है; कम से कम टाइम्स ऑफ़ इंडिया के साथ तो ऐसा ही है| चाहे वो प्रतिभा ‘ताई’ के राष्ट्रपति बनने की ख़बर हो या फिर इंदिरा नूयी की किसी बिज़नेस उपलब्धि की बात हो| मेरे समझ में नहीं आता कि दरअसल ये लोग इस शीर्षक से क्या जाहिर करना चाहते हैं| क्या आपको कुछ समझ आता है इसका तात्पर्य? वैसे मुझे कभी-कभी कुछ आभास जरूर होता है कि कुछ तो है जोकि ये लोग इस वाक्यांश से जताना चाहते हैं, पर मैं इस आभास को शब्द जाल में नहीं बुन पा रहा हूँ| वैसे पुरूष प्रधान समाज से ऐसी बातों की अपेक्षा की जा सकती है| कोई पुरूष चाहे जितना भी आधुनिक, उदारवादी या फ़िर लिंगभेद को न मानने वाला हो पर अपने ऊपर एक स्त्री को देख कर असहज हो जाता है| भले ही कुछ समय में वो अपने आप का ढाल ले और इसे स्वीकार कर ले परन्तु यह ‘कुछ समय’ किसी के लिए भी शून्य नहीं हो सकता| इसके लिए किसी को दोषभावना से ग्रसित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम ऐसे माहौल में बड़े हुए हैं जिसमें इस प्रकार की भावनाओं का मन में आना एकदम नैसर्गिक है| यहाँ पर मैं कानपुर के एक रेस्त्राँ का किस्सा बताना चाहूँगा| यदि देश के अन्य महानगरों के तुलना की जाय तो कानपुर को अभी भी काफ़ी पिछड़ा हुआ ही कहा जायेगा| हुआ कुछ यूँ कि हम लोग एक डिनर पार्टी में गए थे, उस रेस्त्राँ में एक बार भी था| कुछ देर बाद हमने देखा कि वहाँ एक लड़की अपने पिता (सम्भवतः) के साथ आयी और उन्होंने बार पे जाकर कुछ मंगाया| इतना सब देख कर हमारे मित्रों में इस बात पर चर्चा शुरू हो गयी कि “उसे लड़की होते हुए ऐसे करना चाहिए?” अगर देखा जाय तो उसने उतना ही ग़लत किया जितना कि उसका भाई (यदि हो तो) कर सकता था, परन्तु यदि उसकी जगह उसका भाई होता तो शायद हममें से कोई ध्यान भी न देता, बहस तो बड़े दूर की बात है| संभवतः ये “वूमेन ऑन टॉप” भी इसी असहजता का परिणाम है|


मोबाइल फोन शिष्टाचार

November 15, 2007

अक्सर आपने किसी बैठक, सभा या सेमिनार के बीच में किसी न किसी मान्यवर का मोबाइल फोन बजते हुए सुना होगा यद्यपि आयोजक पहले ही घोषित कर देते हैं कि कृपया अपना मोबाइल फोन स्विच ऑफ़ कर दें| यदि किसी आयोजक का ही फ़ोन बजने लगे तो भी कोई अचरज की बात नहीं| इसके दो कारण हो सकते हैं; पहला कि ये मान्यवर स्विच ऑफ़ करने वाले निवेदन को जाने या अनजाने नज़रंदाज़ कर देते हैं या फ़िर दूसरा कि ये बताना चाहते हैं कि “हमरे लगे भी है”| एक ज़माना था (अभी भी शायद चल रहा है) कि लोग अपना मोबाइल दिखाने के बहाने ढूँढ़ते थे जैसे कि सक्रिय हाथ में हमेशा मोबाइल पकड़े रहना, निश्चय ही यह सुविधाजनक तो नहीं रहता होगा| एक और बात है कि नयी नयी रिंग टोन डाउनलोड की है तो जनता को सुनाने का तो फ़र्ज़ बनता है| यदि मोबाइल फोन शिष्टाचार को ध्यान में रखें तो यह उतनी ही अभद्रता है जितना कि किसी सभा में शोर मचाना| दरअसल इसमें पूर्णतया कोई एक व्यक्ति दोषी नहीं है क्योंकि जब बचपन में शिष्टाचार की सीख दी गयी थी तब मोबाइल तो होता नहीं था सो माँ-बाप या गुरू जी ने कुछ बताया नहीं| अब अगर कोई बताता है तो भेजे में उतरता नहीं है| एक बड़े तबके की समस्या यह भी होती है कि उन्हें मोबाइल में नंबर डायल करने या रिसीव करने के सिवा कुछ करना आता ही नहीं है| हर किसी से उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह रातों रात मोबाइल प्रयोग में पारंगत हो जाय परन्तु समस्या यहाँ नहीं कहीं और है| वास्तव में आज जनसाधारण में इस सम्बन्ध में एक समझ का आभाव है| आज जिसे देखो “एक्सपेक्टिंग एन इम्पोर्टेन्ट काल”; पता नहीं चार साल पहले तक दुनिया चलती कैसे थी बिना इस “इम्पोर्टेन्ट काल” के| ईश्वर मोबाइल प्रयोक्ताओं को सदबुद्धि प्रदान करे|