फूलों की घाटी और हेमकुण्ड की यात्रा

मई 11, 2010

उत्तर भारत में जैसे-जैसे भीषण गर्मी का प्रकोप फैलता है, वैसे-वैसे लोग राहत पाने के लिये हिमालय पर स्थित अनेकों रमणीक स्थलों का रुख करते हैं। और देखते ही देखते सुगम्य स्थानों पर पर्यटकों की बाढ़ आ जाती है। ऐसे में यदि आप प्रकृति की सुन्दरता का वास्तव में आनन्द उठाना चाहते हैं तो कुछ अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध और दुर्गम स्थान पर जाने में ही बुद्धिमत्ता है। ऐसा नहीं कि वहाँ पर भीड़ नहीं होगी, हाँ पर कम होगी और भारत की जनसंख्या देखते हुये इससे अधिक की अपेक्षा करना भी ठीक नहीं। इन्हीं स्थानों में से एक है उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ धाम के निकट स्थित फूलों की घाटी। हम लोग पिछले वर्ष सितम्बर माह में यहाँ गये थे, और तभी से ही मैने यह पोस्ट भी लिखना शुरु की थी। पर एक सरकारी परियोजना की भाँति इस पर काम काफी धीमी गति से हुआ, और इसके लिये मैने समय समय पर कई बहाने बनाये। फिर सोचा कि भला कौन हमारी पोस्ट पढ़ने के लिये मरा जा रहा है। आराम से अगला सीजन शुरु होने तक लिखेंगे, और अब जब यह शुरु होने ही वाला है इसलिये आज इसे पूरी कर रहा हूँ। इस पंक्ति के बाद पोस्ट में डिस्कान्टन्यूइटी है, कृपया इस पर ध्यान न देते हुये आगे पढ़ें।

उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा घोषित एक विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) है। इसके निकट ही स्थित हेमकुण्ड एक पहाड़ी हिम कुण्ड है जिसके तट पर एक गुरुद्वारा और एक लक्षमण मन्दिर निर्मित हैं। यहाँ जाने के लिये ॠषिकेश – बद्रीनाथ मार्ग पर जोशीमठ के थोड़ा आगे गोविन्दघाट तक वाहन का और उसके बाद पैदल मार्ग है। इन दोनों स्थान पर जाने का हमारा प्लान बहुत समय से था। इसी बीच हमारे मित्र नीरज और उनके अमेरिकी मित्र टॉड का भारत आना हुआ और हम सबने इस यात्रा पर जाने का निर्णय लिया।

ॠषिकेश - हेमकुण्ड मार्ग

ॠषिकेश - हेमकुण्ड मार्ग

फूलों की घाटी और हेमकुण्ड की यात्रा साल में चार महीनों (जून से सितम्बर) के लिये खुली रहती है। इस यात्रा में समुद्र तल से 1830 मी से 4330 मी तक की कुल 55 किमी की दूरी पैदल या खच्चर पर तय करनी होती है। अतः इसके लिये शारीरिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है। यह यात्रा ॠषिकेश से प्रारम्भ होती है (क्योंकि हमारा घर ॠषिकेश में है :)) और यात्रा के कई साधन हैं। यदि यात्रा में किसी भी प्रकार की अप्राकृतिक असुविधा जैसे यातायात के साधन, विश्रामगृह आदि की अनुपलब्धता से बचना चाहते हैं तो गढ़वाल मंडल विकास निगम का पैकेज टूर कर सकते हैं। इसमें प्रति व्यक्ति करीब 8000 रुपये का खर्चा आता है, जबकि सामान्य बस/टैक्सी आदि से यात्रा करके इसे 4000 रुपये से कम में निपटाया जा सकता है। हमने दूसरा यानी सस्ता और एडवेंचरस रास्ता चुना।

पहला दिन: ॠषिकेश से जोशीमठ (250 किमी सड़क मार्ग )

ॠषिकेश से जोशीमठ की करीब 250 किमी की दूरी तय करने में 8 से 10 घंटे लग जाते हैं। जाने के लिये उपलब्ध साधनों में उत्तराखण्ड परिवहन की बसें (एक हरिद्वार से और एक देहरादून से), गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन (GMOU) की बसें और टैक्सी/जीप मुख्य हैं। बस का किराया 230 – 250 रुपये जबकि जीप का किराया करीब 300 रु है। मार्ग में देवप्रयाग (भागीरथी और अलकनन्दा का संगम), श्रीनगर (पुराने गढ़वाल राज्य की राजधानी), रुद्रप्रयाग (अलकनन्दा और मंदाकिनी का संगम), कर्णप्रयाग (अलकनन्दा और पिण्डर का संगम) और चमोली आदि प्रमुख नगर पड़ते हैं। जोशीमठ और मार्ग के अन्य सभी प्रमुख नगरों में ठहरने के दो सर्वोत्तम स्थान गढ़वाल मंडल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह और बद्रीनाथ – केदारनाथ मन्दिर समिति के विश्रामगृह हैं। रात्रि विश्राम के लिये जोशीमठ ही सबसे उचित स्थान है, वैसे यदि आप यहाँ से 18 किमी और आगे गोविन्दघाट तक पहुँच सकें तो और अच्छा है।

दूसरा दिन: जोशीमठ से घाँघरिया (18 किमी सड़क मार्ग और 13 किमी पैदल मार्ग )

जोशीमठ से गोविन्दघाट का मार्ग प्रातः 6 बजे खुलता है। जोशीमठ से जितना शीघ्र निकलें उतना अच्छा है। जोशीमठ से गोविन्दघाट की 18 किमी की यात्रा में 30 से 45 मिनट का समय लगता है। गोविन्दघाट में बद्रीनाथ से आने वाली निर्मल अलकनन्दा नदी के तट पर एक काफी बड़ा गुरुद्वारा निर्मित है जिसका मुख्य उद्देश्य हेमकुण्ड जाने वाले यात्रियों को विश्रामस्थल उपलब्ध कराना है। यहाँ से पैदल मार्ग प्रारम्भ होता है, अतः यदि आप के पास कुछ भी अतिरिक्त सामान है जिसके बिना आपका काम चल सकता है तो उसे आप यहाँ गुरुद्वारे में उपलब्ध लॉकर में रख सकते हैं। सिखों का प्रसिद्ध तीर्थ होने के नाते यहाँ भी हमें भीड़ में तो कोई खास कमी नहीं मिली परन्तु इसी कारण से सुविधायें जैसे खाने-पीने का सामान, पानी इत्यादि मार्ग भर उपलब्ध रहीं। जोशीमठ से घाँघरिया तक का 13 किमी का रास्ता तय करने में शारीरिक क्षमता के अनुसार 5 से 8 घंटे लग जाते हैं। रास्ता पूरे समय पुष्पावती नदी के साथ साथ चलता है जो फूलों की घाटी से निकलकर गोविन्दघाट के पास अलकनन्दा में मिलती है। मार्ग भर इस नदी की गर्जना और दूध जैसा पानी देखा जा सकता है। रास्ते में दो गाँव पड़ते है पहला गाँव पुलना करीब 3 किमी के बाद और दूसरा गाँव भ्यूंडार करीब 8 किमी बाद। भ्यूंडार इस मार्ग पर स्थित अन्तिम वर्ष पर्यन्त आबादी है, इसके आगे केवल गर्मियों में पर्यटकों की सुविधा और उससे जुड़े रोजगार के लिये ही लोग आते हैं। मार्ग के अन्तिम 3 किमी कुछ ज्यादा ही मुश्किल हैं परन्तु धीरे धीरे निकल ही जाते हैं। घाँघरिया में रात्रि विश्राम हेतु गढ़वाल मंडल विकास निगम का एक पर्यटक आवास गृह और अन्य बहुत से छोटे छोटे होटल हैं। इसके अलावा एक गुरुद्वारा (गोविन्दधाम) भी है जहाँ काफी लोगों के रुकने की व्यवस्था है। यह दिन कुल मिला के शायद यात्रा का सबसे मुश्किल दिन था।

तीसरा दिन: घाँघरिया से फूलों की घाटी और वापस (14 किमी पैदल मार्ग )

घाँघरिया से करीब 1 किमी आगे जाकर फूलों की घाटी और हेमकुण्ड का मार्ग विभक्त हो जाता है। यहाँ से आगे संरक्षित क्षेत्र होने के नाते खच्चरों का प्रवेश वर्जित है। फूलों की घाटी करीब 3 किमी आगे से प्रारम्भ होती है और आगे 7-8 किमी तक विस्तृत है। घाँघरिया से निकलते ही आप मार्ग में झाड़ियों में लगे अनेकों प्रकार के छोटे छोटे फूल देख सकते हैं। फूलों की घाटी में बहार काफी अल्पकालिक होती है। वर्ष में करीब 4 माह (दिसम्बर से मार्च) पूरी घाटी हिमाच्छादित रहती है। अप्रैल में बर्फ पिघलने के साथ ही हरियाली वापस आती है और घाटी में फूलों की सैकड़ों प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। एक समय पर सभी फूल नहीं खिलते अतः यदि आप सभी प्रकार के फूलों को देखना चाहते हैं तो कम से कम तीन बार आना पड़ेगा। यहाँ आने के लिये सम्भव हर माह की विशिष्टता को यदि लें तो उसका सारांश इस प्रकार है: जून – मार्ग में न्यूनतम गन्दगी, जुलाई और अगस्त – सर्वाधिक हरियाली परन्तु बारिश, सितम्बर – कुछ दुर्लभ पुष्प जैसे ब्रह्मकमल और मौसम साफ होने के नाते हिमालय की कुछ दूरस्थ चोटियों के दर्शन। कुल मिला कर हर समय यहाँ देखने के लिये कुछ न कुछ विशिष्ट होता है। हमें यहाँ पर एक इजराइल से आये एक वनस्पति विज्ञानवेत्ता मिले जिन्होंने मार्ग में पड़ने वाले फूलों और पेड़ों की कई प्रजातियों से हमें अवगत कराया। हम लोग घाटी में करीब 4 किमी तक गये और शाम तक घाँघरिया वापस आ गये।

चौथा दिन: घाँघरिया से हेमकुण्ड और वापस (12 किमी पैदल मार्ग )

घाँघरिया से हेमकुण्ड का 6 किमी का मार्ग काफी कठिन है जिसमें करीब 1300 मी की ऊँचाई तय करनी होती है। समुद्र तल से 3000 मी की ऊँचाई से अधिक पर ऑक्सीजन की कमी को महसूस किया जा सकता है। ऐसे में एल्टीट्यूड सिकनेस से बचने के लिये शरीर में पानी की मात्रा अधिक रखनी चाहिये। हेमकुण्ड का मार्ग एक खड़ी पहाड़ी पर चढ़ता है और लगभग पूरे रास्ते से घाँघरिया गाँव को छोटा होता देख सकते हैं। हेमकुण्ड एक पर्वतीय झील है जो उसके तीन ओर स्थित 7 हिमनदों के पिघलने से बनती है। वर्ष में 8 माह यह जमी रहती है और सिर्फ जुलाई से अक्टूबर तक 4 महीनों के लिये पिघलती है। इस झील के तट पर एक गुरुद्वारा और एक लक्षमण मन्दिर बने हुये हैं। जील से एक छोटी नदी लक्षमण गंगा निकलती है जो घाँघरिया में पुष्पावती नदी में मिल जाती है।

पाँचवाँ दिन: घाँघरिया से चमोली (13 किमी पैदल मार्ग और 70 किमी सड़क मार्ग )

घाँघरिया से गोविन्दघाट तक उतरने के सफर काफी आसानी से हो जाता है क्योंकि जैसे जैसे आप नीचे आते हैं ऑक्सीजन की उपलब्धता बढ़ने के साथ ही शरीर में स्फूर्ति आ जाती है। हम लोग करीब 4 घंटे में नीचे उतर आये। उसी दिन हम लोगों ने अगले दिन की यात्रा के मार्ग को कम करने के लिये शाम होने तक चमोली तक का सफर तय कर लिया। यदि घाँघरिया थोड़ा और जल्दी चला जाय तो शाम तक रुद्रप्रयाग पहुँचा जा सकता है, जिससे अगले दिन का सफर और कम हो सकता है।

छठा दिन: चमोली से ॠषिकेश (200 किमी सड़क मार्ग )

चमोली से ॠषिकेश पहुचने में करीब 6 घंटे लगे और दोपहर तक हम लोग घर पहुँच गये। एक तरफ तो 6 दिनों की थकान थी, पर दूसरी ओर प्रकृति की उस छटा का अनुभव जिसे अभी भी इन्सान बरबाद नहीं कर पाया है।

इस पूरी पोस्ट में मैने यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता का कोई खास बखान नहीं किया है क्योंकि शब्दों में यह बताना असम्भव है। कुछ हद तक इसे आप इस फोटो एलबम में देख सकते हैं।

फूलों की घाटी और हेमकुण्ड यात्रा

ख़ुमार बाराबंकवी की कुछ ग़ज़लें…

अगस्त 11, 2009

ख़ुमार बाराबंकवी

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे…

ऐसा नहीं के उनसे मुहब्बत नहीं रही…

एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिये…

वो हमें जिस कदर आजमाते रहे…


…हिमालय की गोद में… – भाग 2

जुलाई 6, 2009

चौथा दिन: मुनश्यारी से चौकोड़ी (लगभग 90 किमी)

बादलों के अधीन मार्ग

बादलों के अधीन मार्ग

सुबह उठे तो देखा कि रात थोड़ी बारिश हुयी है और हवा में भी थोड़ी सिहरन है। समाचार मिला कि टनकपुर तवाघाट राजमार्ग भी कुछ समय के लिये अवरुद्ध रहा। खैर हमें तो उस मार्ग पर अभी दो दिन बाद सफ़र करना था। अगला पड़ाव चौकोड़ी था, जो पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों की सीमा पर स्थित है। जाने का मार्ग थल तक वही था जिससे आये थे उसके बाद बेरीनाग के लिये अलग सकड़ कट जाती है। इस रास्ते में कुछ अलग प्रकार के पहाड़ और चीड़ के सुव्यवस्थित घने जंगल थे। बेरीनाग से करीब 6 किमी पहले चौकोड़ी के लिये रास्ता जाता है जहाँ से ये करीब 3 किमी है। अपराह्न करीब 2 बजे हम लोग चौकोड़ी पहुँचे।
चीड़ के जंगल

चीड़ के जंगल

चौकोड़ी भी एक ठंडी जगह है जो अपने चाय के बगान और हिमालय की चोटियों के दृश्य के लिये प्रसिद्ध है। चाय के बगान तो अब सिर्फ नाम मात्र को रह गये हैं और मौसम की वजह से हिमालय के हिमाच्छादित शिखर भी हमें नहीं दिखे। परन्तु फिर भी बारिश होने की वजह से ठीक ठाक ठंड हो गयी थी। पास ही में एक कस्तूरा मृग (Musk Deer) अनुसंधान केन्द्र है जो शाम को साढ़े तीन बजे तक खुला रहता है। जाने के लिये करीब 2 ढाई किमी का चढ़ाईदार रास्ता है। यह अनुसंधान केन्द्र कम और संरक्षण क्षेत्र अधिक है।
कस्तूरा मृग अनुसंधान केन्द्र जाने का मार्ग

कस्तूरा मृग अनुसंधान केन्द्र जाने का मार्ग

इसमें हिमालय से लाये गये करीब 15 कस्तूरा मृग हैं जिनसे सितम्बर-अक्टूबर में कस्तूरी (Musk) निकाला जाता है। एक नर मृग से एक बार में 10 से 20 ग्राम तक कस्तूरी निकलता है। आजकल मृगों की यह प्रजाति लुप्तप्राय है और हिमालय के बर्फीले इलाकों में कभी कभार ही दिखाई देता है। यहाँ पर फोटोग्राफी निषिद्ध थी इसलिये हमें अपनी आँखों से ही कस्तूरी मृगों को देखकर सन्तुष्ट होना पड़ा। यहाँ पर कुछ देर हमने एक संरक्षक से भी बात की जिन्होंने हमें इन मृगों और उनके रखरखाव के बारे में और कई जानकारियाँ दीं।
चौकोड़ी चाय बगान और पर्यटक आवास गृह

चौकोड़ी चाय बगान और पर्यटक आवास गृह

यहाँ से लौटकर हमलोग बचे खुचे चाय बगान देखने गये। ये चाय बगान अंग्रेजों ने यहाँ लगाये थे परन्तु बहुत कम क्षेत्र में होने के कारण इनका व्यवसायीकरण नहीं हो पाया और आज ये महज एक दर्शनीय स्थल बन कर रह गये हैं। बहरहाल यहाँ से भी घाटी का मनोरम दृश्य देखने को मिलता है। चाय बगान के पीछे देवदार के जंगल हैं जिनके पीछे से घने काले बादल आते देख हमने तुरंत अपने आवास स्थल का रूख किया, फिर भी आते आते बूँदा- बाँदी शुरु हो गयी थी। चौकोड़ी मे स्थित कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के गेस्ट हाउस में एक दो मंजिला मचान भी है जहाँ से नजारा लिया जा सकता है। मैने वहाँ जाकर बी एस एन एल के फुल सिग्नल से घर पर बात की। 🙂

पाँचवाँ दिन: चौकोड़ी से लोहाघाट (लगभग 120 किमी)

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर के निकट

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर के निकट

चौकोड़ी से करीब 40 किमी दूर पाताल भुवनेश्वर नामक एक गुफा मन्दिर है। नास्तिकों के लिये भी यहाँ जाना उतना ही रोमांचक और सुखद है जितना कि आस्तिकों के लिये। किंवदन्ती है कि यहाँ पर पाण्डवों ने तपस्या की और कलियुग में आदि शंकराचार्य ने इसे पुनः खोजा। इस गुफा में प्रवेश का एक संकरा रास्ता है जो कि करीब 100 फीट नीचे जाता है। नीचे एक दूसरे से जुड़ी कई गुफायें है जिन पर पानी रिसने के कारण विभिन्न आकृतियाँ बन गयी है जिनकी तुलना वहाँ के पुजारी अनेकों देवी देवताओं से करते हैं।
हाट कालिका मंदिर

हाट कालिका मंदिर

ये गुफायें पानी ने लाइम स्टोन को काटकर बनाईं हैं। गुफाओं के अन्दर प्रकाश की उचित व्यवस्था है। यह संस्‍मारक भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। यहाँ पर भी फोटोग्राफी मना थी इसलिये केवल प्रकृति के ही फोटो कैमरे में कैद किये। यहाँ से चलकर हमलोग गंगोलीहाट पहुँचे। यहाँ पर प्रसिद्ध हाट कालिका मन्दिर है जो हमारे ड्राइवर की कुल देवी भी हैं। उन्हीं के अनुरोध पर हमलोग यहाँ भी गये। यह मन्दिर कुमाऊँ रेजिमेन्ट का भी मुख्य मन्दिर है, यहाँ पर उनके द्वारा भी स्थापित कुछ स्मारक हैं।
पिथौरागढ़ जाने का पुराना मार्ग

पिथौरागढ़ जाने का पुराना मार्ग

यह भारत भर में स्थित शक्ति पीठों में से एक है और कुमाऊँ मण्डल का सबसे अधिक मान्यता वाला मन्दिर है। गंगोलीहाट से चलकर रामेश्वर होते हुये हमलोग घाट पहुँचे यहाँ से पिथौरागढ़ के लिये रास्ता अलग होता है। ड्राईवर साहब ने हमें पुराना झूलापुल भी दिखाया जिससे पुराने जमाने में लोग पैदल पिथौरागढ़ जाया करते थे। यहाँ से लोहाघाट जाने के लिये वापस हम मुख्य मार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग 125) पर आ गये। रास्ते में काली घटाओं से लुका छिपी खेलते हुये हम लोग शाम करीब 5 बजे लोहाघाट पहुँचे। शाम को लोहाघाट बाजार में कुछ देर घूमे, लंगड़ा आम खाया और कुमाऊँ की प्रसिद्ध बाल मिठाई का भी आनन्द लिया।

छठा दिन: लोहाघाट से खटीमा (लगभग 120 किमी)

बाणासुर के किले से दृश्य

बाणासुर के किले से दृश्य

लोहाघाट में सुबह उठकर सबसे पहले हम लोग बाणासुर के किले पर गये जो यहाँ से खेतीखान मार्ग पर करीब 6 किमी दूर स्थित कर्णकरायत नामक स्थान पर है। किले पर जाने किये डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है, सुबह सुबह तबियत हरी हो गयी। बाणासुर का उल्लेख महाभारत काल में आता है जिसने श्रीकृष्ण जी के पौत्र का अपहरण करके उसे यहाँ छिपा रखा था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे खोज निकाला और उसके साथ युद्ध करके उसका वध कर दिया। किले के वर्तमान अवशेष 16वीं शताब्दी में चन्द राजाओ द्वारा निर्मित हैं जिन्होने उस समय यह किला मध्यकालीन (9वीं सदी) अवशेषों पर बनाया था।
बिच्छू घास

बिच्छू घास

रास्ते भर मैं अपने साथियों को बता रहा था कि पहाड़ों में एक बिच्छू घास होती है जिसके छूने भर से अत्यधिक खुजली और जलन होने लगती है। यह घास देखने में कैसी लगती है यह मुझे ठीक से याद नहीं था। बाणासुर के किले से उतरकर कार में बैठते समय मेरा हाथ बगल की झाड़ी से स्पर्श मात्र हुआ और पता चल गया कि बिच्छू घास कैसी होती है और इसका दर्द कैसा होता है। यह अनुभव लगभग ततैया (yellow wasp) के काटने जैसा ही था। चालक महोदय ने बताया कि कोई लोहे की चीज रगड़ लीजिये जिससे थोड़ा आराम मिला।
मायावती आश्रम में

मायावती आश्रम में

यहाँ से वापस लोहाघाट लौटकर हमलोग मायावती आश्रम के लिये चल दिये जो कि लोहाघाट से करीब 9 किमी दूर देवदार के जंगलों से ढकी एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ पर राम कृष्ण मिशन का अद्वैत आश्रम और एक मिशन अस्पताल स्थित हैं। स्वामी विवेकानन्द सन 1898 में अपनी हिमालय यात्रा के दौरान यहाँ भी आये थे और उन्होने पत्रिका प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन अल्मोड़ा से यहाँ स्थानान्तरित कर दिया।यहाँ पर एक छोटा पुस्तकालय और एक संग्रहालय भी है और पुस्तक भवन है जहाँ से विवेकानन्द साहित्य की पुस्तकें खरीदी भी जा सकती हैं। मायावती से लौटकर हम लोग चम्पावत होते हुये शाम करीब 6 बजे खटीमा वापस पहुँच गये।

सातवाँ दिन: खटीमा से महेंद्रनगर (नेपाल) और वापस (लगभग 50 किमी)

भारत नेपाल सीमा पर आजाद क्षेत्र

भारत नेपाल सीमा पर घास का मैदान

क्योंकि हमारे पास अभी एक दिन और बचा था जो कि हमने बफर के तौर पर रखा था, इसलिये अन्तिम दिन हम लोगों ने पैदल विदेश यात्रा करने का निर्णय लिया। खटीमा टनकपुर मार्ग पर स्थित बनबसा से करीब 15 किमी दूर महेन्द्रनगर स्थित है जो एक समय विदेशी बाजार के कारण आकर्षण का केन्द्र बिन्दु था। मुझे याद है आज से करीब 15 साल पहले लोग वहाँ से जूते, जैकेट, इमरजेन्सी लाइट, जीन्स इत्यादि लाया करते थे। आज वैसे तो सारा सामान भारत में भी उपलब्ध है फिर भी वहाँ जाना एक दिन के लिये एक अच्छी पिकनिक है।
बनबसा डैम का मॉडल

बनबसा डैम का मॉडल

महेन्द्रनगर का रास्ता बनबसा डैम से होकर जाता जो आजादी से कुछ समय पूर्व ही बनना शुरू हुआ था। उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी नहर शारदा नहर यहीं से निकलती है पास में ही लोहियाहेड नामक स्थान पर एक जलविद्युत परियोजना भी है। डैम को पार करते ही भारतीय सीमा समाप्त हो जाती है यहीं पर भारतीय चौकी है। यहाँ से करीब 2 किमी दूर गड्डा चौकी नेपाली चेक पोस्ट है। गड्डा चौकी से महेन्द्रनगर के लिये बस चलती है।
शारदा नहर के किनारे पर थके हुये लोग :)

शारदा नहर के किनारे पर थके हुये लोग 🙂

हमलोग कुछ देर यहाँ के बाज़ार में घूमे, पेट भरा 🙂 और रस्म अदायगी के लिये 15 रुपये का एक नेलकटर खरीद लिया, वैसे नेलकटर के स्वामित्व को लेकर अभी भी हमारे बीच कुछ मतभेद हैं 🙂 । लौटते समय हमलोग गड्डा चौकी से बनबसा (6 किमी) तक पैदल ही आये बीच में डैम पर और फिर नहर के किनारे कुछ देर विश्राम किया। इस दौरान यही चिन्ता हमें खाई जा रही थी कि कल से फिर कानपुर की भीषण गर्मी झेलनी है, यह हमारे चेहरों पर साफ झलक रहा था। 9 दिनों की इस यात्रा में खाने के अतिरिक्त प्रतिव्यक्ति करीब 4 हजार रुपये का खर्च आया जिसे और कम किया जा सकता था। खैर कुल मिलाकर पूरा अनुभव अविस्मरणीय रहा।


एक सप्ताह हिमालय की गोद में… – भाग 1

जुलाई 4, 2009

इस साल पूरे उत्तर भारत और खासकर कानपुर में गर्मी ने हद ही पर कर दी थी। एक ही उपाय सुझाया इससे बचने का कि पहाड़ों में चलते हैं। नैनीताल, मसूरी और शिमला तो पहले ही घूम चुके थे और इन सभी की गर्मियों में भीड़ भाड़ के कारण बुरी हालत हो जाती है इसलिये सोचा कि थोड़ी शान्त और एकान्त जगह चलते हैं।

यात्रा मार्ग

यात्रा मार्ग

मेरा बचपन खटीमा (उस समय नैनीताल और अब उत्तराखण्ड के उधम सिंह नगर जनपद में स्थित) में बीता है और तभी से सपना था पिथौरागढ़ जाने का जो इस बार जाकर साकार हुआ। मैंनें और तीन सहपाठियों अनुपम, विकास और टोनी को अपने साथ चलने को तैयार किया और 20 जून की शाम को कानपुर से निकल पड़े। पिथौरागढ़ जाने के दो रास्ते हैं एक हल्द्वानी से अल्मोड़ा बागेश्वर होते हुये और दूसरा खटीमा से चम्पावत होते हुये। इतनी आसान सी बात को समझने में विकास को काफ़ी दिक्कत हुई पर अन्त में समझ आ ही गया। 🙂 खटीमा में कुछ पुराने मित्रों की सहायता से टैक्सी (मारुति वैगेनार) बुक हो गयी और 22 जून की सुबह खटीमा से चलना तय हुआ। कानपुर से खटीमा जाने के लिये सबसे उपयुक्त ट्रेन नैनीताल एक्स्प्रेस (लखनऊ से खटीमा) में रिज़र्वेशन न मिल पाने के कारण हमलोग बरेली तक ट्रेन से गये और फिर वहाँ से बस लेकर 21 जून की सुबह करीब 8 बजे खटीमा पहुँच गये।
नानक सागर

नानक सागर

पहला दिन हम लोगों ने नानकमत्ता जाने के अलावा अपनी सारी ऊर्जा को आराम करके संचित करने में बिताया। नानकमत्ता में सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी आये थे और आज वहाँ एक काफ़ी बड़ा गुरुद्वारा है। पास में ही नानकसागर है जो कि कुछ छोटी नदियों और बरसात में पानी को एकत्रित करके वर्ष भर कई नदी और नहरों के माध्यम में सिंचाई में प्रयुक्त होता है। इससे निकलने वाली सबसे प्रमुख नदी देवहा है जो आगे चलकर गोमती में मिलती है। शाम को मैंने खटीमा की कुछ पुरानी यादें ताजा की और मित्रों ईश्वर (जिसने हमारे लिये सारा इन्तजाम करवाया) और गोपाल के साथ कुछ समय बिताया।

पहला दिन: खटीमा से पिथौरागढ़ (लगभग 160 किमी)

सुबह करीब 7 बजे हमलोग हिमालय की सैर के लिये खटीमा से रवाना हुये। राष्ट्रीय राजमार्ग 125, जो टनकपुर से तवाघाट तक जाता है, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन द्वारा संचालित होने के कारण अन्य पहाड़ी सड़कों की तुलना में काफ़ी अच्छा है। हमें केवल सूखीढाँग के पास ही करीब 5 किमी का खराब टुकड़ा मिला।

श्यामलाताल

श्यामलाताल

सूखीढाँग से मुख्य मार्ग से करीब 5 किमी की दूरी पर श्यामलाताल स्थित है जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई करीब 1520 मी है। यहाँ पर विवेकानन्द आश्रम के अतिरिक्त एक छोटा ताल है जो कि हमें गर्मी का मौसम होने के कारण और भी छोटी स्थिति में मिला। यहाँ पर चाय और थोड़ी देर के विश्राम के बाद हम लोग चम्पावत के लिये निकल पड़े। चम्पावत होते हुये करीब तीन घंटे में हम लोग लोहाघाट पहुँच गये।
एबट माउन्ट

एबट माउन्ट

यहाँ थोड़ा रुककर हमने दोपहर का भोजन लिया और पास ही में स्थित एक चोटी एबट माउन्ट के लिये चल पड़े। सड़क का रास्ता करीब 9 किमी का है जबकि पैदल का रास्ता 4 किमी लम्बा है। एबट माउन्ट समुद्र तल से 2130 मी की ऊँचाई पर स्थित लोहाघाट के आसपास का सबसे ऊँचा स्थान है। इस चोटी की खोज ब्रिटिश इंडिया में झाँसी के जॉन हेरॉल्ड एबट ने 1914 में की थी। देवदार और ओक के पेड़ों से भरपूर इस चोटी से वृहद हिमालय की कई बर्फ़ीली चोटियों के साथ घाटी का विहंगम दृश्य मिलता है।
चण्डाक से पिथौरागढ़ का दृश्य

चण्डाक से पिथौरागढ़ का दृश्य

मौसम साफ़ न होने के कारण हम लोगों को बहुत अच्छा दृश्य तो देखने को नहीं मिला परन्तु ठंडी हवाओं के बीच वहाँ के दृश्य स्थल पर बैठना अपने आप में बहुत सुखदायी था। यहाँ पर जीर्णावस्था में एक चर्च भी है जो देखने लायक है। एबट माउन्ट से करीब डेढ़ बजे हम लोग पिथौरागढ़ के लिये चल पड़े। घाट होते हुये करीब चार बजे हम लोग पिथौरागढ़ पहुँच गये। अपना सामान कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के पर्यटक आवास गृह में रखकर हमलोग यहाँ से 6 किमी दूर स्थित चोटी चण्डाक पर गये। यहाँ से पूरे पिथौरागढ़ का दृश्य देखने को मिलता है और यदि आसमान साफ हो तो हिमालय की चोटियाँ भी दिखाई देती हैं।

दूसरा दिन: पिथौरागढ़ से मुनश्यारी (लगभग 120 किमी)

पिथौरागढ़ से मुनश्यारी करीब 120 किमी दूर है परन्तु संकरी सड़क और टेढ़े-मेढ़े मार्ग के कारण 6-7 घंटे लग जाते हैं। रास्ते में बहुत से ऐसे स्थान आते हैं जहाँ से पहाड़ियों, घाटियों और नदियों का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।

रामगंगा

रामगंगा

पिथौरागढ़ से मुनश्यारी के दो रास्ते हैं। एक देवल थल, थल, तेजाम, गिरगाँव होते हुये और दूसरा ओग्ला, अस्कोट, जौलजीबी और मडकोट होककर। पहला मार्ग करीब 30 किमी छोटा पड़ता है, जबकि यदि अस्कोट में कस्तूरी मृग संरक्षित उद्यान देखते हुये जाना हो तो दूसरा मार्ग उचित है। हमने प्रथम मार्ग चुना क्योंकि अस्कोट कम ऊँचाई पर होने के कारण गर्मियों में गर्म हो जाता है और ऐसे में जानवर भी ठंडी जगहों में छुपे रहते हैं।
बिर्थी झरना

बिर्थी झरना

देवलथल के आहे से थल तक करीब 7-8 किमी का रास्ता रामगंगा नदी के किनारे किनारे जाता है और दो पहाड़ियों के मध्य पथरीले रास्ते से बहता नदी का निर्मल जल देखते ही बनता है। यहाँ पर कुछ देर के लिये हमलोग रुककर नदी के पानी तक भी गये। थल के आगे फिर से चढ़ाई शुरु हो जाती है और तेजाम आने के बाद सामने पहाड़ी पर बहुत दूर और ऊपर कुछ झरने सा दिखाई देता है। अगले करीब आधे घंटे तक हम लोग इसी बात पर बहस करते रहे कि यह बिर्थी झरना है या नहीं और अगर है तो वहाँ तक पहुँचना संभव है नहीं।
मुनश्यारी मार्ग में एक दृश्य

मुनश्यारी मार्ग में एक दृश्य

आखिरकार ये बिर्थी झरना ही निकला और दो ऊँची पहाड़ियों को जोड़ने वाले दो पुलों की सहायता से हम लोग बिर्थी झरने के निकट पहुँच गये। सड़क से झरने तक जाने के लिये करीब 300 मीटर की खड़ी चढ़ाई थी झरने को पास से देखने की उत्सुकता में हाँफते हुये झरने के पास पहुँचे तो उसमें नहाये बिना रहा न गया। वहाँ मौजूद कुछ अन्य लोगों ने हमारी सहायता की और बताया कि कौन कौन से पत्थर फिसलन युक्त हैं और उन पर कैसे सावधानी पूर्वक चला जाय। ठंडे पानी ने सारी थकान मिटा दी। नहाने के बाद पानी में हमें कुछ जोंक, मेढक और एक साँप के दर्शन हुये, जो अगर पहले दिख जाता तो शायद नहाने की जुर्रत नहीं करते।
जोहर घाटी

जोहर घाटी

हममें से एक को करीब 3 फुट लम्बी गोह भी दिखी वहाँ पर। उसके बाद हमलोग गिरगाँव, रातापानी होते हुये मुनश्यारी पहुँच गये। यहाँ भी हमने कुमाऊँ मण्डल विकास निगम का पर्यटक आवास गृह ही रुकने के लिये चुना। शाम को हम लोग पास में ही स्थित नंदा देवी मंदिर गये यह मुनश्यारी के एक ओर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है और यहाँ से जोहर घाटी और उसके पार हिमालय की गगन चुम्बी चोटियाँ दिखाई देती हैं, जिसमें सबसे प्रमुख पंचचुली है। परन्तु मौसम ने यहाँ भी हमें निराश किया और हमें घाटी और हिमालय की प्रथम श्रेणी को देखकर ही संतुष्ट होना पड़ा।

तीसरा दिन: मुनश्यारी में

तीसरा दिन यात्रा का सबसे रोचक दिन था। इसके कई कारण थे; पहला तो हमने इस दिन कहीं की भी यात्रा नहीं की पूरा दिन मुनश्यारी के आस पास की जगहों पर ही जा कर बिताया, दूसरा इस दिन हमलोग करीब 12 किमी पैदल चले वो भी पहाड़ी रास्तों पे, तीसरा और सबसे मुख्य इस दिन हमें पहाड़ी महिलाओं के अग्रणी और उदारवादी होने का जीवंत उदाहरण मिला 🙂 (आगे पढ़िये)।

महेश्वरी कुण्ड का मार्ग

महेश्वरी कुण्ड का मार्ग

प्रातः नाश्ते से पहले हम लोग एक बार फिर से नंदा देवी मंदिर के पास गये और पिछले दिन के बचे हुये कुछ जगहों पर उतर कर गये। दो ढाई किमी की कसरत तो वहीं हो गयी। जलपान के बाद हनलोग पास में स्थित एक पहाड़ी तालाब (alpine lake) माहेश्वरी कुण्ड (या महेसर कुण्ड) देखने गये। माहेश्वरी कुण्ड जाने के लिये करीब 2 किमी की चढ़ाई है, यहाँ से भी मुनश्यारी और जोहर घाटी के दृश्य के साथ हिमालय की चोटियाँ दिखती हैं। ऊपर एक छोटा कुण्ड है जिसमें मुख्यतः बरसाती पानी ही एकत्रित होता है। कुछ देर हम लोग वहाँ बैठे तो कुछ शरारती बालकों ने आकर हमें बताया कि ये मुख्य कुण्ड नहीं है बल्कि आगे है।
माहेश्वरी कुण्ड

माहेश्वरी कुण्ड

पहले तो हमें यकीन नहीं हुआ। पर थोड़ी जाँच पड़ताल के बाद हम लोग आगे बढ़े तो वाकई वहाँ एक और कुण्ड था पर उसमें पानी कम और शैवाल अधिक उगे हुये थे। यहाँ अनुपम ने अपने चापू डी एस एल आर कैमरे से कुछ नेशनल ज्योग्राफिक वाले फोटो खींचे और हम लोगों ने पेड़ की घनी छाया में सूखी काई लगे पत्थर पर बैठकर आराम किया। उसके बाद हम लोगों ने कुछ समय पहले वाले कुण्ड के निकट घास के मैदान में भी बिताया। (कहानी में ट्विस्ट 🙂 ) यहीं पर कुछ पहाड़ी महिलायें भी कुछ दूरी पर बैठ कर सुस्ता रहीं थीं, वे सब वहाँ से रेता-बजरी ले जाने के लिये आई हुयी थीं।
पुराना माहेश्वरी कुण्ड

पुराना माहेश्वरी कुण्ड

शायद उन्होंने हम लोगों को देखा होगा क्योंकि हमारे अलावा वहाँ पर कोई अन्य पर्यटक नहीं था। हम लोग विकास के साथ कुछ मजाक कर रहे थे। वापस लौटते समय हमनें देखा कि एक जगह पर छाया में वही महिलाये बैठी हुयीं है, जो कि रेता-बजरी नीचे ले जा रही थी और रास्ते में कुछ देर विश्राम कर रहीं थीं। एक एक कर करके टोनी, अनुपम और मैं आगे निकल गये। विकास जिसे ऊँचाई से डर भी लगता है आहिस्ता आहिस्ता उतर रहा था इसलिये पीछे रह गया। जब वह महिलाओं के समीप आया तो उनमें से एक ने उससे पूछा, “आप पीछे रह गये… चला नहीं जा रहा क्या?” विकास ने कहा “नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।” और इतना कहकर तेजी से नीचे उतरने लगा। जब हमारे पास पहुँचा तो हमने पूछा कि क्या हुआ तो उसने बताया कि वो सब छेड़ने को हो रहीं थीं। 🙂 जो भी हो इससे एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि पहाड़ी महिलायें अग्रणी और उदारवादी विचारों वाली होती हैं। यदि आपने कभी पहाड़ी जीवनचर्या पर गौर किया हो तो आप ने अवश्य देखा होगा कि वहाँ पर महिलाये पुरुषों से अधिक शारीरिक श्रम और घर के बाहर के काम करती हैं। शाम के समय हम लोग ज़ारा रिसोर्ट के ऊपर वाली पहाड़ी पर भी गये और तेज हवा के झोकों में हवाई कलाबाजी करते पक्षियों के साथ कुछ समय बिताया।

अगले भाग में शेष तीन दिनों का लेखा जोखा …


बात करनी मुझे मुशकिल कभी ऐसी तो न थी…

जून 18, 2009

स्वर:मेंहदी हसन
रचना: बहादुर शाह ज़फ़र


सरफ़रोशी की तमन्ना (गुलाल)

मार्च 27, 2009

हाल में ही प्रदर्शित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म गुलाल का संगीत काफ़ी प्रभावशाली है। आज के दौर पर कटाक्ष ये छोटा सा छन्द जोकि बिस्मिल के “सरफ़रोशी की तमन्ना” का एक्स्टेंशन है, मुझे बहुत अच्छा लगा। आप भी सुनिये –

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ
देखते कि मुल्क़ सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गये
अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के तिल में है

आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्ढी भी सिलती इंगलिसों की मिल में है


एक कटु अनुभव…

मार्च 17, 2009

किसी ने सही कहा है कि

“Remarkable thing about the life is that
it can never be so bad that it can not get worse.”

जीवन कई ऐसे पल आते जब इस बात के महत्त्व और गूढ़ता का आभास होता है। परसों मेरे साथ कुछ ऐसा ही घटित हुआ। यह मेरी चौथी कलकत्ता यात्रा थी। मेरी पिछली यात्राओं का अनुभव कुछ खास सुखद नहीं रहा, कभी ममता बनर्जी का बंगाल बन्द तो कभी झारखण्ड बन्द, कभी भीषण उमस भरी गर्मी और कभी खराब आतिथ्य। परन्तु इस बार कानपुर से कलकत्ता यात्रा भी अच्छी थी, वहाँ का मौसम भी अच्छा था और कॉन्फ्रेंस का आयोजन भी वैदिक विलेज नामक रिसॉर्ट में काफी अच्छा रहा। एक बार को लगा कि इस बार मिथक टूट गया परन्तु लौटते समय सब बराबर हो गया। हमारा (मैं और मेरे सहयोगी) लौटने का टिकट हावड़ा राजधानी में 8 और 9 वेटिंग था जो कि रिज़र्वेशन माफ़िया के चलते केवल 2 और 3 वेटिंग तक ही आ सका। जिस ट्रेन में 500 से अधिक सीटें हो उसमें 9 वेटिंग पूरा न होना काफी अस्वाभविक था। खैर जैसे ही स्टेशन में घुसे हमें कई रिज़र्वेशन माफ़िया के एजेंटों ने घेर लिया जैसे हमारे चेहरे पे लिखा हो कि इनके पास टिकट नहीं है। क्योंकि ट्रेन छूटने में अभी पर्याप्त समय था इसलिये हम लोगों ने कुछ समय भ्रष्टाचार में भागी बनने या न बनने का निर्णय लेने में गुजारा। बचपन में हमें सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र की कहानी सुनाई जाती है परन्तु उस कहानी में एक समस्या यह है कि जितना कष्ट उन्होंने सत्य का साथ देने में झेला उसके अनुरूप उन्हें कोई फल नहीं मिला। शायद यही कारण है कि आज लोग ये तो मानते हैं कि सत्य का साथ देना एक अच्छी बात है पर राजा हरिशचन्द्र की हद तक सत्य का साथ देना बेवकूफी माना जाता है। आखिरकार हमने भी राजा हरिशचन्द्र न बनते हुये ड्योढ़े दाम में उसी ट्रेन से मुगलसराय तक का उपलब्ध टिकट खरीदा और सोचा कि आगे देख लेंगे जो होगा। कुछ देर में देखा टीटी महोदय को बड़े बड़े लोगों के फोन आ रहे हैं और अन्य लोग भी बंगाली में बोलकर उन्हें पटाने की कोशिश कर रहें हैं। हमारे पास ये सब कुछ नहीं था इसलिये एक बार प्रयास किया और उनसे कहा कि भई हमारा टिकट क्लियर नहीं हुआ और कारण आप से अधिक कौन जान सकता है। हम आई आई टी से हैं। महानुभाव शिक्षित थे अर्थात उन्हें आई आई टी के बारे में पता था और शायद यह भी कि ये ज्यादा बवाल नहीं करेंगे। बोले बेटा “आई नो, यू आर द फ़्यूचर ऑफ़ दिस कंट्री; बट आई कैन नॉट गिव यू द बर्थ ऐज़ पर द रूल्स …” और भी कुछ नियम कानून की और कुछ चिकनी चुपड़ी बातें जो देखा जाय अपने आप में कुछ भी गलत नहीं थीं। आशा की कोई किरण न देख हमने सोचा कि अपने शुभेच्छुओं को ही लपेटा जाय, यद्यपि आत्मा पूरी तरह गवाही नहीं दे पा रही थी। दो चार फोन घुमाये, हिदायत मिली कि मुगलसराय उतरकर किसी और ट्रेन में देख लें कुछ सहायता वहाँ का रेल स्टाफ कर देगा। रात एक बजे मुगलसराय उतरकर आने वाली कई ट्रेनों को टटोला और अन्त में चार बजे एक ट्रेन में जगह मिली। हम ये सोच कर सो गये कि चलो ज्यादा परेशानी नहीं हुयी चार पाँच घण्टा देर से सही पर कानपुर पहुँच तो जायेंगे। कुछ समय बाद टी टी महोदय आये और हमारा टिकट और चेहरा देख कर जाने लगे। हमने कहा स्लीपर का टिकट बना दीजिये तो बोले आप वहीं हैं न जिन्हें उन्होनें बैठाया था, कोई बात नहीं हम साथ तो चल ही रहे हैं… आप आराम से सोइये। हम भी पुनः एक बार भ्रष्टाचार बढ़ाते हुये शान्ति से सो गये। पुनः जब आँख खुली तो देखा कि एक दूसरे टी टी महोदय हमसे टिकट माँग रहे हैं। पता चला कि इलाहाबाद में स्टाफ बदल गया है। और इन महोदय को पिछले टी टी ने हमारे बारे में कोई जानकारी नहीं दी, (पता नहीं फिर उन्होंने हमें ढूढ़ा कैसे?) बोले चार सौ रुपये निकालिये। हमने कहा कि चार सौ किस बात के हम जगह पूछ कर बैठे थे आप टिकट बनाइये। बोले टिकट बनेगा तो ढाई सौ रुपये पेनाल्टी के साथ। यहाँ पर बात सिर्फ पैसों की नहीं थी क्योंकि हमें इस बात का पूरा एहसास था कि ये टी टी हमें जान-बूझ कर परेशान कर रहा है। मजबूर होकर हमें एक बार फिर फोन घुमाना पड़ा। थोड़ी वर्तालाप के बाद मामला निपटा और टी टी भाषा भी काफी कुछ सभ्य हो गयी। अगले एक घण्टे तक हम लोग इन्तजार करते रहे कि अब और क्या बुरा हो सकता है। ईश्वर की कृपा से उसके बाद सब यथावत चला और हम घर पहुँच गये। उसके बाद काफी समय तक मन अशान्त रहा सोचते रहे कि जो कुछ भी हमने किया कितना न्यायसंगत था और कितना तर्कसंगत। निश्चय ही इसका कोई उत्तर नहीं है हमारे पास, बस सोचा कि थोड़ा लिख दें तो मन हल्का हो जायेगा।

खैर इतना समझ में आया कि हरिशचन्द्र की राह पर न चलने पर भी उतनी ही मुसीबतें आ सकतीं हैं इसलिये कोई भी निर्णय लेते समय उसके दूरगामी परिणामों को ही ध्यान में रखना चाहिये, राह में मुसीबतें तो आती ही रहेंगी।