हम अंतराग्नि क्यों मनाते हैं?

कल से आई.आई.टी. कानपुर का साढ़े तीन दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव ‘अंतराग्नि’ प्रारम्भ हुआ| जहन में एक सवाल आया कि आख़िर हम अंतराग्नि क्यों मनाते हैं? थोड़े विचारमंथन के बाद समझ आया कि यहाँ आई.आई.टी. में स्त्री-पुरूष लिङ्गानुपात १/१० से भी कम है, इस प्रताड़ना के पीछे आख़िर हमारा दोष ही क्या है? यही कि बचपन में हमने पढ़ाई-लिखाई में थोड़ा अधिक मन लगाया था या फिर कि हमने जीवविज्ञान जैसे रटने वाले विषय से ज्यादा प्रमुखता गणित को दी| आख़िर हमारे मन में भी यश चोपड़ा के चलचित्र देखकर कुछ कुछ होता है और यदि ऐसे कुछ उत्सव हमारी कुछ संभावनाओं को बढ़ा दें तो हर्ज़ ही क्या है? गत पाँच वर्षों में हमने इसी उत्सव में कई छोटी सी लव स्टोरीस देखीं, सफल तो शायद कोई न हो सका पर थोड़े समय की सफलता को भी सफलता ही कहा जाएगा| बी.टेक. के समय हमने एक फोसला नामक संगठन का नाम सुना था| ज्ञातव्य हो कि फोसला (FOSLA) का पूर्ण रूप है फ्रस्टेटेड वन साइडेड लवर्स एसोसिएसन है और यह संगठन भारत में लगभग सभी संस्थानों में (मुख्यतः ईंजीनिअरिंग) पाया जाता है| यहाँ भी आप इसके सदस्यों को अंतराग्नि के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम डिस्कोथेक के मुख्य द्वार के बाहर लम्बी कतारों में खड़ा पा सकते हैं| डिस्कोथेक प्रांगण में प्रवेश हेतु इन लोगों का धैर्य देखने योग्य होता है| घंटों तक कतार में खड़े रहने के बाद जब कुछ बालाओं को अपने साथियों के साथ डिस्को करता हुआ देख लेते हैं तो सारी थकान दूर हो जाती है| भारतीय दर्शन का इससे अच्छा उदाहरण क्या होगा? पर सुखे सुखम्| इसके अतिरिक्त अंतराग्नि के कुछ और भी फ़ायदे हैं| पता चलता है कि समाज किस ओर अग्रसर है तथा आजकल फैशन में क्या है| हमें वास्तविकता का एहसास कराता है, यह भी याद दिलाता है कि आई.आई.टी. में आकर कितनी बड़ी भूल हो गयी है और यथाशीघ्र यहाँ से अपना प्रोग्राम ख़त्म करके निकलो|

आप सोच रहे होंगे कि अभी तक मैंने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के तथाकथित मुख्य उद्देश्य, संस्कृति व कला के प्रोत्साहन का तो उल्लेख किया ही नहीं| परन्तु यह वास्तविकता है कि संस्कृति व कला को न तो आयोजकों ने और न ही भाग लेने वालों ने प्रथम वरीयता दी है| उदाहरण के लिए नाट्यस्पंदन, सुर (गायन) और नटराज (नृत्य स्पर्धा) जैसे कार्यक्रम सबसे कम लोकप्रिय हैं जबकि ऋतम्भरा (फैशन शो), डिस्कोथेक व ब्लाइंड डेट जैसे कार्यक्रम काफी लोकप्रिय रहते हैं| यदि आप एक पेशेवर कलाकार के कार्यक्रम की लोकप्रियता को कला का प्रोत्साहन कहना चाहें तो मेरी नजरों में यह कला का नहीं बल्कि स्टारडम का क्रेज़ है| खैर सही भी है आज जब टीवी, फिल्मों और मीडिया वालों को संस्कृति व कला की परवाह नहीं है तो क्या हमीं ने ठेका उठाया है इसका?

अंतराग्नि की आधिकारिक वेब साइट: http://antaragni.iitk.ac.in/

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4 Responses to हम अंतराग्नि क्यों मनाते हैं?

  1. Gyan Dutt Pandey कहते हैं:

    आपने तो हमें अपने पुराने जमाने की स्मृतियों में ठेल दिया जब पिलानी में ‘ओसिस’ के दौरान हम पगलाये रहते थे!

  2. A. G. कहते हैं:

    1. “यदि ऐसे कुछ उत्सव हमारी कुछ संभावनाओं को बढ़ा दें तो हर्ज़ ही क्या है?” — कौन सी संभावनाएं? :-p

    2. They’ve named the fashion show “रिताम्भारा”. What does the word “रिताम्भारा” mean in more common language? Also, what does the word “मृदाक्ष” mean? If I’m not wrong, it is something like “मृदा + अक्ष”. Right?

  3. अंकुर वर्मा कहते हैं:

    पहले प्रश्न का उत्तर देने की तो कोई आवश्यकता मुझे लगती नहीं है क्योंकि कुछ बातें अस्पष्ट रूप से कहीं जांय तभी शालीन लगतीं हैं| दूसरे सवाल का जवाब देने की कोशिश कर सकता हूँ| संभवतः ऋतम्भरा, इन्द्र देव के दरबार में एक अप्सरा थीं तो आप चाहें तो इसे आधुनिक परिपेक्ष्य में फैशन शो से जोड़ सकते हैं| और जी हाँ मृदाक्ष मतलब मृदा (मिट्टी) का अक्ष (कोई मूल्यवान वस्तु), अर्थात् इसे वक्तित्व खोज से संबंधित कर सकते हैं|

  4. kakesh कहते हैं:

    चलिये आप तो नियमित लिखने लगे. अच्छी लगी आप की अंतराग्नि.;-)

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