“जस्ट-फॉर-वूमेन” संकल्पना

यदि आप दिल्ली, मुम्बई या कोलकाता में रहते हैं तो शायद सुना होगा “जस्ट-फॉर-वूमेन रेडियो चैनल (Meow) १०४.८ ऍफ़ एम”|

म्याऊँ

हमने अपनी पिछली दिल्ली यात्रा के दौरान जून २००७ में इसका विज्ञापन देखा था पर उस समय कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया| फ़िर अभी जब पिछले महीने कोलकाता गए तो यह पुनः आंखों के सामने आया| इस बार क्योंकि एक सप्ताह का समय था अतः इस “जस्ट फॉर वूमन” की संकल्पना के बारे में थोड़ा सोचा| यदि आप इस चैनल को सुने (जोकि कौतूहलवश मैंने किया) तो शायद ही आपको अन्य चैनलों से कोई भिन्नता नज़र आए, परिचारक के चुनाव में भी कोई लिंगभेद नहीं किया जाता| तो फ़िर “जस्ट फॉर वूमन” ऐसा क्या है? वस्तुत: कुछ भी नहीं; शायद दिन में घरेलू महिलाओं के लिए कार्यक्रम कुछ अधिक समय के लिए आता होगा| वास्तव में यह “जस्ट फॉर वूमन” एक कोशिश है इस प्रतियोगी युग में बिना कुछ अतिरिक्त किए अपनी पहचान बनाने की| स्त्रियाँ इस लिए सुनेंगी क्योंकि उनका चैनल है और पुरूष अपनी जिज्ञासावश कि स्त्रियों के चैनल पर ऐसा क्या आता है? वैसे तो “जस्ट फॉर वूमन” एक पुरानी कार्यनीति है| सरिता, गृहशोभा, वनिता इत्यादि पत्रिकाएं पुरुषों में भी उतनी ही लोकप्रिय हैं फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि इन पत्रिकाओं में मेरे हिसाब से स्त्रियों के लिए काफ़ी कुछ विशेष होता है, परन्तु रेडियो चैनल पर मुझे ऐसा कुछ भी नहीं मिला| शायद स्त्री-पुरूष समानता के इस युग में कोई दोनों की रुचियों में भी कोई अन्तर नहीं बचा है|

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3 Responses to “जस्ट-फॉर-वूमेन” संकल्पना

  1. Gyan Dutt Pandey कहते हैं:

    पुरुष भी तो जस्ट फॉर वूमेन हैं! 🙂

  2. kakesh कहते हैं:

    इसमें काफी कार्यक्रम हैं जो स्त्रियों के लिये ही बनाये गये हैं..हाँ बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.

  3. राजीव् तनेजा कहते हैं:

    मेरे ख्याल में तो ये विरोधी सैक्स को भरमाने मात्र के लिए नाम दिया गया है …जिसमें काम को करने से रोका जाता है…उसी को करने को ज़्यादा मन ललचाता है…

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