लिनक्स के रास्ते के रोड़े

आज से करीब सात साल पहले जब हमने पहली बार लिनक्स (या लाइनेक्स जो भी बोलें) ऑपरेटिंग सिस्टम का नाम तथा इसके फायदों के बारे में अपने मित्रों से सुना तो सोचा कि क्यों न एक बार परखा जाय| हमने अपने कंप्यूटर पर लाल टोपी (red hat) ७ संस्थापित किया| धीरे -धीरे काफ़ी कुछ सीखा परन्तु न तो यह इतना प्रयोक्ता मैत्रिपूर्ण लगा और न ही इतनी रूचि उत्पन्न नहीं हो पाई कि माइक्रोसॉफ्ट विन्डोज़ का साथ पूर्णतया छोड़ दें| समय के साथ लिनक्स ने काफ़ी तरक्की की है आज उबुन्टू, फेडोरा, सुसे इत्यादि लिनक्स वितरण हर क्षेत्र में माइक्रोसॉफ्ट विन्डोज़ एक्स.पी. और विस्टा को टक्कर देने में सक्षम हैं| फ़िर लिनक्स की सफलता के रास्ते में कौन खड़ा है ? क्यों आज भी लोग एक मुफ़्त में मिलने वाली वस्तु से अधिक वरीयता एक महंगी वस्तु को दे रहे हैं? भारत में शायद विन्डोज़ की सफलता के पीछे एक बड़ा हाथ यहाँ के लचर नक़ल निरोधक कानून (anti piracy laws) का है क्योंकि अन्यथा लोग विन्डोज़ खरीदने के लिए शायद ४ से २० हज़ार रुपये देना पसंद नहीं करते| परन्तु ऐसा भी नहीं है कि जहाँ इन कानूनों का पालन होता है वहाँ लिनक्स लोकप्रिय हो गया है| मेरे विचार से लिनक्स की असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण लिनक्स ख़ुद है| कैसे? लिनक्स को विकसित करने वाले लोगों ने हमेशा से ही इसे एक कम्प्यूटर में अतिरिक्त दिलचस्पी लेने वालों के लिए बनाना चाहा है जोकि ५ प्रतिशत से भी कम हैं | कभी भी उनका लक्ष्य एक आम प्रयोक्ता और उसकी जरूरतें नहीं रहीं| उदाहरण के लिए आपको आज १०० से भी अधिक सक्रिय लिनक्स वितरण मिल जायेंगे; हर वितरण अपने आप को दूसरे से श्रेष्ठतर बताएगा| आपको हर काम के लिए दसियों सॉफ्टवेयर मिल जायेंगे| किसी का भी प्रयास इन सभी की खूबियों को एकीकृत करके एक अकेला सर्वसक्षम सॉफ्टवेयर बनाने की दिशा में नहीं है| हर लिनक्स वितरण तथा प्रमुख सॉफ्टवेयर्स को बढ़ावा देने के लिए एक प्रयोक्ता समूह होता है जोकि दूसरे सॉफ्टवेयर्स की खूबियों को नज़रंदाज़ करते हुए अपनी ही विशिष्टता को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करेगा|

एक आम आदमी जिसे कि सीमित कंप्यूटर ज्ञान है यदि आज एक लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम चलाने की इच्छा रखता है तो उसके सामने आने वाली दुविधाओं को देखते हैं| सर्वप्रथम कौन सा लिनक्स वितरण? उबुन्टू बहुत प्रयोक्ता मैत्रिपूर्ण और सरल है… नया वाला फेडोरा देखा क्या मस्त लुक है… सुसे की तो बात ही कुछ और है… जितने मुहँ उतनी बात| चलिए मान लिया कि आपने थोड़ी रिसर्च के बाद एक वितरण चुन लिया| अब कौन सा डेस्कटॉप परिवेश? ग्नोम २ ने तो सभी को पीछे छोड़ दिया है… के.डी.ई ४ को आने दो फ़िर देखते हैं कि कौन अच्छा है… अरे ग्नोम और के.डी.ई दोनों ही काफ़ी भारी हैं फ्लक्सबॉक्स देखो इतना हल्का और सारे फीचर्स भी हैं| यदि किसी प्रकार से आपने इस समस्या से भी पार पा लिया तो आगे आपको हर काम के लिए इसी प्रकार से अनेकों विकल्प मिलेंगे| यह मान भी लें कि इस परस्पर प्रतियोगिता के भी अपने लाभ हैं तो भी एक आम प्रयोक्ता के लिए यह कोई मायने नहीं रखता | उसे चाहिए एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम जो कि न्यूनतम प्रयास में प्रयोग हेतु तैयार हो जाय जोकि आज विन्डोज़ बखूबी कर रहा है| भले ही लिनक्स प्रसंशक इसकी लोकप्रियता के कितने ही दावे करें परन्तु वर्तमान परिदृश्य में इसका डेस्कटॉप बाज़ार अंश ५ प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता क्योंकि इस समय ५ प्रतिशत लोगों की ही आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिनक्स का विकास हो रहा है |
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मैं स्वयं एक लिनक्स प्रशंसक हूँ और करीब डेढ़ साल से उबुन्टू प्रयोग कर रहा हूँ|

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9 Responses to लिनक्स के रास्ते के रोड़े

  1. A. G. कहते हैं:

    First of all, I’m very sorry for the comment in English. In what follows, by “you”, I mean a general user.

    Some very good points you made in your post. But there are certain things that set GNU/Linux (or any other free –as in freedom– operating system) apart from Microsoft Windows. We will look into that, but tell me one thing first: Why even after Apple has released its operating system for popular hardware, and it has been more than a year, people don’t use it like they use Microsoft Windows? I’m not talking about popularity. Let me be a bit clear on this to put my question in perspective: In IIT Kanpur, it is easy to get Mac OS X (free of charge), and there are people capable enough who can spin it on their hardware if they want to. But, even in IIT nobody uses it except in the cases when they bought system from Apple itself! Literally. And Mac OS, the way apple ships it, targets the same user base, does not put people in dilemmas like what desktop environment to use. And you’d agree that visual appeal is far better than Windows XP or even Vista’s. One possible explanation is the lack of easily available software. So who is responsible for that? It is a vicious circle. People start using it, more software comes, but people won’t use it because there is a dearth of software. Right? So, comparing Windows with Linux raises a question, viz, why not compare Windows with Mac? I know why not! Because Mac can never gain as much popularity as Linux or Windows and that people in India use a Mac rarely or never.

    Now the difference in the popularities of Windows and Linux has the answer in the difference in who is building them.

    So, why is GNU/Linux not popular as Windows is, yet? There are several reasons, and the one you quoted (of dilemma) is a minor one compared to others: Linux is a community development project. When it started, it was an academic project, with the idea of giving back the community what the developer of it learnt from it. It could never participate, until recently, with the industry as there was no corporation whose flagship project it was. In the case of Windows, the aggressive partnerships of Microsoft with other industries where desktop computers were required gave Windows the position what it has now. A person using Windows in office environment would want to use it at his home too, as it keeps things simple. That is how it gained popularity in homes too. Besides, Linux could not have as aggressive marketing as Windows, for the same reason, that it does not belong to any corporation. Marketing is a corporation idea by the very meaning of it.

    Now the question of dilemma finds its answer in: because there are so many choices and that has the same explanation, it being a community developed project, now with the inputs from corporations too. Why are there so many choices? Well… freedom! If I don’t like anything, I can go and code it for me, myself and release it for the world to see and use it. If someone has a similar taste as I have, (s)he will start using my software and that is how it will gain popularity. I could code the software because I had other code to see. It is like academia, where people write many books on the same topic, with the additional comfort of free of cost in the Linux’s case. Which book you choose is your taste, or the taste of the teacher.

    Another question: When you were introduced to computers, if it were the case that pirated free copies of Windows were banned in India and you or your institute/college/school had to buy Windows to be able to use it, would you have been using it then? At that time, in the free/open software world, the major desktop env. or windows managers were FVWM and Enlightenment. You would have been using them right now on either BSD or Red Hat or Debian GNU/Linux! And you’d have been comfortable with that just like you’re now with Windows. [I know you (as in Ankur) are comfortable with both, but as I mentioned, “you” is directed as a generic pronoun.] There are so many distributions simply because if I didn’t like Red Hat, I had the choice of having my own distribution as I wished — again, things are that open and easy in free software world, as you yourself know.

    The question of why not make it as simple as Windows. Well… you answered that. First, with Ubuntu, things are really simple. No?
    Next, because most people don’t sell their Linux distribution. Those who sell make things simple for their users, just go and buy if you can, just like you should do with Windows! Those who make things available freely will not sustain if they keep on doing this: code own distribution (those who do so have things really simple for them), then make it simple to use for everyone. Why? They are not getting any money out of it, and they don’t need simplicity for themselves.

    It is लिनक्स, by the way.

  2. आलोक कुमार कहते हैं:

    आपका लेख मुख्यतः डेस्कटॉप प्रयोक्ता की ओर केंद्रित है और मुझे लगता है उबुंतु उस दिशा में सही कदम उठा रहा है।

  3. उन्मुक्त कहते हैं:

    मैं नहीं जानता कि लिनेक्स है या फिर लाईनेक्स या फिर लीनुक्स। हांलाकि फिनलैण्ड में जहां इसका जन्म हुआ यह लीनुक्स कहलाता है।
    मैं पिछले आठ सालों से लिनेक्स प्रयोग कर रहा हूं अलग समय में अलग वितरण प्रयोग करता हूं। मेरे विचार से इसके लोकप्रिय न होने का कारण, अधिकतर लोगों को ओपेन सोर्स के बारे में समुचित जानकारी न होना है। यदि यह स्कूल स्तर पर बताया जाने लगे तो बहुत जल्द ही समीकरण बदल सकता है। ऐसे ५ साल बाद यह हालात बदल जायेंगे। लोग ओपेन सोर्स के बारे में जानने लगे हैं।

  4. kakesh कहते हैं:

    पिछ्ले नौ सालों में लिंनेक्स के कई वर्जन इस्तेमाल किये.लेकिन पूर्णत: लिनक्स पर कभी भी आश्रित नहीं हो पाया. कारण शायद वही रहे जो आपने बताये. एक डैस्क्टोप प्रयोक्ता के लिये लिंनक्स अभी भी पहेली ही है.

  5. अंकुर गुप्ता कहते हैं:

    मैने अपने ब्लाग पर उबंटू लाइनेक्स पर कई लेख दिये हैं जिन्हे पढ़कर आपको लगेगा कि उबंटू कितना आसान है.
    रही बात पापुलरिटी की तो मैं अपना अनुभव इस प्रकार कह सकता हूं कि अगर विंडोज के सारे प्रोग्राम लाइनेक्स मे चल जायें तो मैं विंडोज छोड़ दूंगा. मेरा विचार है कि लाइनेक्स के आंतरिक ढांचे को अगर ऐसा बनाया जाये कि विंडोज के प्रोग्राम उसमे चल सकें तो बहुत अच्छा रहे. उबंटू ७.१० को देखकर ऐसा लगता है कि ये पूरी तरह से विंडोज विस्टा को टक्कर देने के लिये बनाया गया है.
    मेरा ब्लाग यह रहा –
    http://ankurthoughts.blogspot.com
    मेरी वेबसाइट – http://www.vibgyorlife.com

  6. रवि कहते हैं:

    कुछ बातें तो आपने सही ही कही हैं -, और लोग भी बहुत पहले से कहते रहे हैं – लिनक्स अभी भी इस्तेमाल में गीकी ही है. किसी एक उपयोक्ता का लिनक्स डेस्कटॉप मजाल है कोई दूसरा उपयोक्ता आसानी से इस्तेमाल कर दिखाए! (वैसे, यह इसकी ख़ूबी है,)

  7. विकास कहते हैं:

    और अगर कहीं ड्राइवर से संबंधित सम्स्या आ जाये, जो कि आम बात है तो नये लोगों की तो हालत खराब हो जाती है. कुछ इंस्टाल करना भी next क्लिक करने जितना आसान नहीं. 😉

  8. नितेशे एस कहते हैं:

    मुझे लगता है, लिनक्स के इतना पापुलर नाँ होने का प्रमुख कारण विन्डोज़ का बाज़ार मे पहले पर्दापर्ण है. जबतक लिनक्स यूज़र फ़्रेंड्ली होए, तबतक विन्डोज़ काफ़ी ज़्यादा इस्तेमाल होने लगा था और हर तरह के साँफ़्टवेयर मिलने लगे थे। मुझे अगर आज सारे विन्डोज़ एप्लीकेशन के अल्टरनेट मिल जाये तो मैं विन्डोज़ फिर कभी इस्तेमाल ना करूँ , पर ऎसा हो नहीं सकता, क्योंकि बहुत सी कम्पनीज़ अपना युज़र बेस देखके साँफ़्टवेयर बनाती हैं और लिनक्स का यूज़र बेस, इसीलिए कम है की उसमें ऎसे कई पर्टीक्यूलर साफ़्टवेयर नहीं मिल पाते जो विन्डोज़ में आसानी से उपलब्ध हैं । बिलकुल अन्डा और मुर्गी वाली स्थिति है ।

  9. Ratan singh Shekhawat कहते हैं:

    लिनक्स के वितरणों के बारे में जानकारी नहीं थी फेडोरा इस्तेमाल किया लेकिन बिना किसी तकनीकी जानकारी के पूरी तरह सफल नहीं हो सका | अंकुर गुप्ता की सलाह पर उबुन्टू का प्रयोग किया और तब से विण्डो चलाना अटपटा ही लगता है | नए लोगो के लिए उबुन्टू सबसे उपयुक्त व् सरल लिनक्स वितरण है | wine के इस्तेमाल से उबुन्टू में विण्डो की कई अप्लिकेशन चल जाती है जिससे ये सभी की पसंद बनता जा रहा है |

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