प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी कैसे कार्य करता है?

सूक्ष्मदर्शियों का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए आइये जानते हैं सबसे सरल और प्रचलित सूक्ष्मदर्शी को, जिसे प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी (optical microscope) कहते हैं| जीहाँ मैं उसी सूक्ष्मदर्शी की बात कर रहा हूँ जोकि कक्षा ९ या १० में विज्ञान के गुरु जी ने पढ़ाया था| क्योंकि उन्नत सूक्ष्मदार्शियों के अध्ययन से पहले इस सूक्ष्मदर्शी के सिद्धांत की समझ आवश्यक है अतः संक्षेप में इसके बारे में जानकारी करते हैं| जैसा कि आप सभी जानते होंगे इस सूक्ष्मदर्शी का निर्माण दो उत्तल (convex) लेंसों से होता है (इसी वजह से इसे संयुक्त सूक्ष्मदर्शी (compound microscope) भी कहते हैं), जिन्हें वस्तुनिष्ठ (objective) लेंस और नेत्रिका (eye piece) कहते हैं| सूक्ष्मदर्शी में प्रतिबिम्ब निर्माण कैसे होता है यह नीचे दिए गए किरण आरेख से समझा जा सकता है| सर्वप्रथम वस्तुनिष्ठ लेंस से एक वास्तविक प्रतिबिम्ब नेत्रिका के फोकस केन्द्र के अन्दर बनता है जिसे नेत्रिका आवर्धित करके एक आभासी प्रतिबिम्ब के रूप में बना देती है|

प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी का किरण आरेख

 

सूक्ष्मदर्शी का कुल आवर्धन दोनों लेंसों के आवर्धन के गुणनफल के बराबर होता है| वस्तुनिष्ठ लेंस प्रायः ५, १०, २०, ५० तथा १०० गुणा आवर्धन के होते हैं जबकि नेत्रिका ५ व १० गुणा आवर्धन के साथ आती है| अर्थात् संयुक्त प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी से अधिकतम १००० गुणा आवर्धन प्राप्त हो सकता है| मानवीय नेत्रों की विभेदन क्षमता (resolving power / resolution) करीब ०.२ मिलीमीटर होती है अर्थात् हम न्यूनतम ०.२ मिलीमीटर की दूरी पर स्थित वस्तुओं में भेद कर सकते हैं| अतः संयुक्त प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी से १००० गुणा आवर्धन के पश्चात् ०.२ माइक्रॉन (या २०० नैनोमीटर) की विभेदन क्षमता सम्भव है| इस सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार सर्वप्रथम रॉबर्ट हुक ने १६६५ में किया था| उस समय की अपेक्षा में आधुनिक सूक्ष्मदर्शी की संरचना काफ़ी जटिल होती है; इसमें दो आधारभूत लेंसों के अतिरिक्त अन्य कई लेंस प्रयोग में लाये जाते हैं जोकि प्रतिबिम्ब की गुणवत्ता में सुधार लाते हैं|

अब प्रश्न यह उठता है कि इस सूक्ष्मदर्शी से २०० नैनोमीटर से छोटी वस्तुएं क्यों नहीं देखी जा सकतीं? कारण यदि साधारण भाषा में कहा जाय तो यह है कि इस सूक्ष्मदर्शी में प्रतिबिम्ब निर्माण दृश्य प्रकाश किरणों से होता है जिनकी तरंग दैर्ध्य ४०० से ७०० नैनोमीटर होती है| रैले मानदण्ड (Rayleigh Criterion) के अनुसार किसी भी सूक्ष्मदर्शी की विभेदन क्षमता उसमे प्रयुक्त प्रकाश की तरंग दैर्ध्य के आधे से अधिक नहीं हो सकती| अतः २०० नैनोमीटर संयुक्त सूक्ष्मदर्शी की मूलभूत सीमा है| यद्यपि पिछले पाँच दशकों में कई नए प्रकार के प्रकाशिक सूक्ष्मदार्शियों का विकास किया गया है जिनके द्वारा अब ५० नैनोमीटर से भी कम देख पाना सम्भव है तथा प्रतिबिम्ब गुणवत्ता मैं भी काफ़ी सुधार हुआ है| इनमें से संनाभि सूक्ष्मदर्शी (Confocal Microscope) तथा स्कैनिंग नियर फील्ड प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी (Scanning Near Field Optical Microscope, SNOM/NSOM) उल्लेखनीय हैं| ये दोनों ही सूक्ष्मदर्शी आजकल जैव तथा नैनो वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग किए जाते हैं| इनकी कार्यप्रणाली भविष्य में कभी बताऊंगा|

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2 Responses to प्रकाशिक सूक्ष्मदर्शी कैसे कार्य करता है?

  1. Gyan Dutt Pandey कहते हैं:

    अच्छा रहा। इसी बहाने पुराना पढ़ा कुछ कुलबुलाने लगा।
    तो किस फ्रीक्वेंसी की कौन सी किरणें प्रयोग करते हैं नेनोटेक्नॉलॉजी में?

  2. अंकुर वर्मा कहते हैं:

    जहाँ तक प्रकाशिक सूक्ष्मदार्शियों का प्रश्न है उनमें सदैव दृश्य प्रकाश ही प्रयुक्त होता है, अर्थात ४०० से ७०० नैनोमीटर (फ्रीक्वेंसी निकाल लीजिये)| परन्तु आधुनिक प्रकाशिक सूक्ष्मदार्शियों में कुछ ऐसे आधारभूत बदलाव किए गए हैं जिससे कि वे रैले मानदण्ड से मुक्त हो गए हैं| आगे की फिजिक्स थोड़ी जटिल है इसलिए एक अलग पोस्ट में ही बताऊंगा| 🙂

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