चोरी-चोरी

सन १९५६ में राजकपूर साहब की एक फ़िल्म आयी थी चोरी चोरी, ये रात भीगी भीगी… आजा सनम मधुर चाँदनी में हम… कुछ याद आया| अच्छा पंछी बनूँ उड़के चलूँ दूर गगन में… रसिक बलमा… जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो… अब भी याद नहीं आया| एक अमीर बाप की बेटी… जीवन में कुछ एडवेंचर के लिए घर से भागना… रास्ते में नवयुवक से मुलाकात… पहले नोक झोंक फ़िर प्यार… फ़िर थोड़ा मिथ्याबोध (misunderstanding) और फ़िर कहानी का सुखद अंत | अगर अभी भी नहीं याद नहीं आया तो दिमाग़ पे और जोर देने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि आपने ये फ़िल्म देखी ही नहीं है| बचपन में जब मैंने यह फ़िल्म देखी थी तो बाकी सब तो ठीक लगा पर शीर्षक का औचित्य समझ नहीं आया| और अगर आप यह तर्क दें कि नायक और नायिका में प्यार चोरी चोरी हुआ तो फ़िर ५० प्रतिशत से अधिक फिल्मों का नाम चोरी-चोरी होना चाहिए| उसके बाद देखी महमूद की ‘बोम्बे टु गोवा’ और आमिर खान – पूजा भट्ट की ‘दिल है कि मानता नहीं’ आदि फिल्में भी चोरी-चोरी से प्रभावित लगीं पर दुविधा के बदल तब छंटे जब देखी फ्रैंक काप्रा की १९३४ में आयी ‘इट हैपंड वन नाईट’| दरअसल चोरी-चोरी इस अंग्रेजी फ़िल्म का हूबहू नक़ल थी और इसी लिए शायद फ़िल्म के लेखक/निर्देशक/निर्माता ने पूरी ईमानदारी के साथ फ़िल्म का नाम ही चोरी-चोरी रख दिया| इससे पता चलता है कि सफ़ल विदेशी सिनेमा के हिन्दी नक़ल का सिलसिला कितना पुराना है| यदि मैं यहाँ पर ऐसी ही हिन्दी फिल्मों की सूची बनाना शुरू करूं तो सबसे लंबे हिन्दी ब्लॉग का कीर्तिमान तो बन ही जायेगा| मैंने पिछले पाँच-सात सालों में करीब ४०० से अधिक विदेशी फिल्में देखी होंगी जिससे अब मनोरंजन हेतु हिन्दी फिल्में देखने से विरक्ति सी हो गयी है| हाँ कभी कभी पीड़ानन्द के लिए हिन्दी फिल्मों का रूख हो जाता है| इसी कारण से पिछले दिनों आयी ‘रामगोपाल वर्मा की आग’ और कैश सरीखी अत्यन्त घटिया फिल्में हमसे अछूती नहीं रही|

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4 Responses to चोरी-चोरी

  1. अजित वडनेरकर कहते हैं:

    एकदम से सहमत हैं साब आपकी बातों से । हम भी कब से हिन्दी फिल्में देखना छोड़ चुके हैं। साल में एकाध देख ली तो देख ली वर्ना हर हफ्ते एक हॉलिवुडी देख लेते हैं। कम से कम गाने तो नहीं होते उसमें ।

  2. नीरज रोहिल्ला कहते हैं:

    पाँच सालों में ४०० फ़िल्में, भईया पी.एच.डी. वाले वैसे ही बहुत बदनाम हैं ऐसे आँकडे तो सार्वजनिक न करो 🙂

    हिन्दी फ़िम्लों में हम तो आजकल केवल मिथुन की फ़िल्में देखते हैं वो सब ओरिजनल होती हैं 🙂 वैसे भारत से इतनी फ़िल्में लेकर आया था अभी तक एक भी देखने का मौका नहीं मिला। अगले हफ़्ते २-४ चाँपता हूँ ।

  3. अंकुर वर्मा कहते हैं:

    मित्र पहले तो मैंने लिखा है पांच-सात साल मतलब आप अपनी सुविधानुसार कुछ भी सोच लें जोकि पाँच से सात साल के बीच में हो| और अधिकतर फिल्में मैंने अपने बी-टेक व एम-टेक के दौरान ही देखी थीं | पी-एच. डी. में तो गिनती अभी पचास भी नहीं पहुँची होगी| इसलिए इस लेख में पी-एच. डी. वालों को बदनाम करने वाली कोई भी बात नहीं उजागर की गयी है|

  4. नीरज रोहिल्ला कहते हैं:

    मित्रवर,
    चलो बढिया है, हमें तो एक डर था जो तुमने दूर कर दिया ।

    वैसे सोचने वाले अब भी सोच सकते हैं कि जो बी.टेक/एम.टेक में खूब पिक्चरें देखते हैं वो ही पी.एच.डी. भी करते हैं 🙂

    मित्र अपने बनाये हुये कार्टून भी लगाओ अपने चिट्ठे पर तब लगे कि किसी कलाकार का चिट्ठा है ।

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