बैग पर एयरलाइन्स का टैग

हमारे देश ने पिछले १०-१५ वर्षों में काफ़ी तरक्की की है। मुख्यतः सॉफ्टवेयर धूम के कारण देश के खासकर मध्यम वर्ग के लोगों में बहुत समृद्धि आयी है। पर इन सबके साथ आये सांस्कृतिक बदलाव और उसकी बदहजमी की झलक यहाँ-वहाँ देखने को मिल ही जाती है। अब सामान पर लगे एयरलाइन्स के टैग को ही ले लीजिये। यात्रा के बाद भी उसे न हटाया जाना किसी न किसी स्तर पर यह प्रयोक्ता की इस चेष्टा को उजागर करता है कि हाँ भाई लोगों हम भी हवाई जहाज की यात्रा कर चुके हैं। अपने मोबाइल को बिना वजह सार्वजनिक स्थान पर निकाल कर देखना, लघु संदेश पढ़ना भी कुछ इसी प्रकार का प्रयास है। यह सब एकदम ऐसा लगता है मानो आपने किसी १९ वीं सदी के गाँव से आये आदमी को नयी वी.आई.पी की चड्ढी दी हो और सबको दिखाने के उद्देश्य से उसने वह पतलून के ऊपर से पहन ली हो। या फ़िर रेलगाड़ी के वातानुकूलित डिब्बे में सफ़र करके अपने आप को बहुत परिष्कृत दिखाना, बोलना कि “ये स्लीपर कोच कितने गन्दे और अनकम्फ़र्टेबल होते हैं, पता नहीं लोग कैसे सफ़र करते हैं उसमें” जैसे खुद पहले कभी उसमें गये ही न हों। सम्पन्नता बुरी नहीं है, परन्तु उसे पाकर अपना अतीत, और सभ्यता भुला देना घातक सिद्ध हो सकता है।

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