कभी कहा न किसी से

शायर: क़मर जलाबादी
स्वर: ग़ुलाम अली/ नूरजहाँ

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे ख़बर हो गई जमाने को

चमन में बर्क़ नहीं छोड़ती किसी सूरत
तरह तरह से बनाता हूँ आशियाने को
(बर्क़ == बिजली)

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

सुना है गैर की महफ़िल में तुम न जाओगे
कहो तो आज सजा लूँ ग़रीबख़ाने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

दुआ बहार की माँगी तो इतने फूल खिले
कहीं जगह न मिली मेरे आशियाने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

चमन में जाना तो सय्याद देख कर जाना
अकेला छोड़ के आया हूँ आशियाने को
(सय्याद == शिकारी)

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

मेरी लहद पे पतंगों का ख़ून होता है
हुज़ूर शम्मा न लाया करें जलाने को
(लहद == कब्र)

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

दबा के क़ब्र में सब चल दिये दुआ न सलाम
ज़रा सी देर में क्या हो गया ज़माने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

अब आगे इस में तुम्हारा भी नाम आयेगा
जो हुक्म हो तो यहीं छोड़ दूँ फ़साने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को…

‘क़मर’ ज़रा भी नहीं तुमको ख़ौफ़-ए-रुसवाई
चले हो चाँदनी शब में उन्हें मनाने को

कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे ख़बर हो गई जमाने को

यू-ट्यूब वीडियो:

ग़ुलाम अली की आवाज़ में

नूरजहाँ की आवाज़ में

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One Response to कभी कहा न किसी से

  1. yunus कहते हैं:

    शायद पहली बार यहां आया । अच्‍छा लगा भाई ।

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