कू-ब-कू फैल गयी बात

रचना: परवीन शाकिर
स्वर: मेंहदी हसन
राग: दरबारी

कू-ब-कू फैल गयी बात शनासाई की
उसने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की
(कू-ब-कू == गली गली में, शनासाई == जान पहचान, पज़ीराई == स्वागत)

कैसे कह दूँ के मुझे छोड़ दिया है उसने
बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की

वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की
(हरजाई == बेवफ़ा)

उसने जलती हुयी पेशानी पे जब हाथ रखा
रूह तक आ गयी तासीर मसीहाई की
(पेशानी == माथा, तासीर == असर)

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझपे गुज़रे न क़यामत शबे तन्हाई की

यू-ट्यूब वीडियो:
मेंहदी हसन की आवाज़ में ग़ज़ल

परवीन शाकिर एक मुशायरे में

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2 Responses to कू-ब-कू फैल गयी बात

  1. विनय प्रजापति कहते हैं:

    फैल, शबे-तन्हाई | if you have time then correct it, shaandar ghazal of parveen shakir. she is amazing ghazal writter.

  2. अंकुर वर्मा कहते हैं:

    विनय जी, आपके द्वारा प्रस्तावित शुद्धियाँ कर दीं हैं। परवीन शाक़िर वाकई एक अच्छी उर्दू शायर थीं। 1994 में एक सड़क दुर्घटना में उनकी असामयिक मृत्यु हो गयी थी।

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