न किसी की आँख का नूर हूँ

रचना: नवाब बहादुर शाह ज़फ़र
स्वर: मोहम्मद रफ़ी/हबीब वली मोहम्मद

न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सका, मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
(ग़ुबार == धूल)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

न तो मैं किसी का हबीब हूँ, न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ, जो उजड़ गया वो दयार हूँ
(हबीब == प्यारा/ दोस्त, रक़ीब == दुश्मन, दयार == शहर)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा यार मुझसे बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया, मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

न किसी की आँख का नूर हूँ…

पये फ़ातेहा कोई आये क्यों, कोई चार फूल चढ़ाये क्यों
‘ज़फ़र’ अश्क कोई बहाये क्यों, मैं वो बेक़सी का मज़ार हूँ
(बेक़सी == मजबूरी)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ, मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा, किसी दिलजले की पुकार हूँ
(जाँफ़िशाँ == कड़ी मेहनत)

न किसी की आँख का नूर हूँ…

यू-ट्यूब वीडियो:
मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में

हबीब वली मोहम्मद की आवाज़ में

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One Response to न किसी की आँख का नूर हूँ

  1. halchal कहते हैं:

    जफर की यह कविता ऐतिहासिक है और रफी की प्रस्तुति भी लजवाब।

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