ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर

रचना: अख़्तर शिरानी
स्वर: नय्यारा नूर

ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर बरबाद न कर

ऐ इश्क़ न छेड़ आ आ के हमें, हम भूले हुओं को याद न कर
पहले ही बहुत नाशाद हैं हम, तू और हमें नाशाद न कर
क़िस्मत का सितम ही कम नहीं कुछ, ये ताज़ा सितम इजाद न कर
यूँ ज़ुल्म न कर बेदाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(नाशाद == उदास, बेदाद == अन्याय)

जिस दिन से मिले हैं दोनों का, सब चैन गया आराम गया
चेहरों से बहार-ए-सुबह गई, आँखों से फ़रोग़-ए-शाम गया
हाथों से ख़ुशी का जाम छूटा, होंठों से हँसी का नाम गया
ग़म्ग़ीं न बना नाशाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(फ़रोग ==चिराग़, ग़म्ग़ीं == दुःख में डूबा)

रातों को उठ उठ कर रोते हैं, रो रो के दुआएँ करते हैं
आँखों में तसव्वुर दिल में ख़लिश, सर धुनते हैं आहें भरते हैं
ऐ इश्क़ ये कैसा रोग लगा, जीते हैं न ज़ालिम मरते हैं
ये ज़ुल्म तो ऐ जल्लाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(तसव्वुर == उम्मीद, ख़लिश == दर्द, बेचैनी)

जिस दिन से बँधा है ध्यान तेरा, घबराये हुये से रहते हैं
हर वक़्त तसव्वुर कर कर के, शर्माये हुये से रहते हैं
कुम्हलाये हुये फूलों की तरह, कुम्हलाये हुये से रहते हैं
पामाल न कर बेदाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(पामाल == पैरों तले कुचलना)

ये रोग लगा है जबसे हमें, रंजीदा हूँ मैं बीमार है वो
हर वक़्त तपिश हर वक़्त ख़लिश, बेख़्वाब हूँ मैं बेदार है वो
जीने से इधर बेज़ार हूँ मैं मरने पे उधर तय्यार है वो
और ज़ब्त कहे फ़रियाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(रंजीदा == असंतुष्ट, बेदार == चौकन्ना, बेज़ार == अप्रसन्न, ज़ब्त == अधिग्रहण)

बेदर्द ज़रा इन्साफ़ तो कर, इस उम्र में और मग़मूम है वो
फूलों की तरह नाज़ुक है अभी, तारों की तरह मासूम है वो
ये हुस्न सितम ये रंज ग़ज़ब, मजबूर हूँ मैं मज़लूम है वो
मज़लूम पे यूँ बेदाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(मग़मूम == दुःखी, रंज == दुःख, मज़लूम == दुःखियारा)

ऐ इश्क़ ख़ुदारा देख कहीं, वो शोख़ हसीं बदनाम न हों
वो माह-ए-लक़ा बदनाम न हो, वो ज़ोहरा-जबीं बदनाम न हो
नामूस का उस को पास रहे, वो पर्दा-नशीं बदनाम न हो
उस पर्दा-नशीं को याद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(शोख़ == आकर्षक, नामूस == इज्जत, पर्दा-नशीं == पर्दे में रहने वाली)

उम्मीद की झूठी जन्नत के, रह रह के न दिखला ख़्वाब हमें
आईंदा के फ़र्ज़ी इशरत के, वादे से न कर बेताब हमें
कहता है ज़माना जिस को ख़ुशी, आती है नज़र कामयाब हमें
छोड़ ऐसी ख़ुशी को याद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(इशरत == खुशी)

दो दिन में ही अहद-ए-तिफ़ली के, मासूम ज़माने भूल गये
आँखों से वो ख़ुशियाँ मिट सी गयीं, लब के वो तराने भूल गये
उन पाक बहिश्ती ख़्वाबों के, दिलचस्प फ़साने भूल गये
उन ख़्वाबों से यूँ आज़ाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(तिफ़ली == यौवन, बहिश्त == जन्नत)

आँखों को ये क्या आज़ार हुआ, हर जज़्ब-ए-निहाँ पर रो देना
आहंग-ए-तरब पे झुक जाना, आवाज़-ए-फ़ुग़ाँ पर रो देना
बरबत की सदा पर रो देना, मुतरिब के बयाँ पर रो देना
एहसास को ग़म बुनियाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(आज़ार == परेशानी, निहाँ ==छुपा हुआ, आहंग == लय, तरब == आनन्द,
फ़ुग़ाँ == कराह, बरबत == बीन, मुतरिब == गायक/गायिका)

जी चाहता है इक दूसरे को, यूँ आठ पहर हम करें
आँखों में बसायें ख़्वाबों को, और दिल को ख़याल आबाद करें
ख़िल्वत में भी जो जल्वत का सामाँ, वहदत को दुई से शाद करें
ये आरज़ूएं इजाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(ख़िल्वत == एकान्त, वहदत == बेजोड़, शाद == मग्न)

वो राज है ये ग़म आह जिसे, पा जाये कोई तो ख़ैर नहीं
आँखों से जब आँसू बहते हैं, आ जाये कोई तो ख़ैर नहीं
ज़ालिम है ये दुनिया दिल को यहाँ, भा जाये कोई तो ख़ैर नहीं
है ज़ुल्म मगर फ़रियाद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर

दुनिया का तमाशा देख लिया, ग़म्ग़ीं सी है बेताब सी है
उम्मीद यहाँ इक वहम सी है, तस्कीन यहाँ इक ख़्वाब सी है
दुनिया में ख़ुशी का नाम नहीं, दुनिया में ख़ुशी नायाब सी है
दुनिया में ख़ुशी को याद न कर, ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर
(तस्कीन == सुख)

यू-ट्यूब वीडियो:

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5 Responses to ऐ इश्क़ हमें बरबाद न कर

  1. विनय प्रजापति कहते हैं:

    कमाल करने में कोई आप-सी महारत कहाँ से लाए, क्या ख़ूब !

  2. वेद प्रकाश कहते हैं:

    वाह, वाह, लाजवाब.

    ऐसी चीज़ की ही ज़रूरत थी.

  3. vikash कहते हैं:

    सातवीं कक्षा में ये नज्म पढ़ी थी. २-३ पारा याद था बाकी सब भूल गया था. बहुत बहुत धन्यवाद आपको. पढ़कर मन आनंदित हो गया.

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