मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए

रचना: मिर्ज़ा असदल्लाह ख़ाँ ‘ग़ालिब’

मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए
जोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किये हुए
(क़दह == प्याला)

करता हूँ जमा फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
अरसा हुआ है दावत-ए-मिज़्श्गाँ किये हुए
(लख़्त == टुकड़ा, मिज़्श्गाँ == पलक)

फिर वज़ा-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गिरेबाँ किये हुए
(वज़ा == स्वभाव, चाक == फटा हुआ, गिरेबाँ == कॉलर)

फिर गर्मनाला हाये शररबार है नफ़स
मुद्दत हुई है सैर-ए-चराग़ाँ किये हुए
(शररबार == बरसते हुये शोले, नफ़स == साँस)

फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
सामाँ-ए-सदहज़ार नमकदाँ किये हुए
(पुर्सिश == पूछ्ताछ, सद == सौ, नमकदाँ == नमक का बर्तन)

फिर भर रहा हूँ ख़ामा-ए-मिज़्श्गाँ बाख़ून-ए-दिल
साज़-ए-चमनतराज़ी-ए-दामाँ किये हुए
(ख़ामा == कलम, साज़ == चाह, तराज़ी == अनुमति देना)

बाहमदिगर हुए हैं दिल-ओ-दीदा फिर रक़ीब
नज़्ज़ारा-ओ-ख़याल का सामाँ किये हुए
(हमदिगर == आपस का, सामाँ == सामना करना)

दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाये है
पिंदार का सनमकदा वीराँ किये हुए
(तवाफ़ == जाल, घेराव, मलामत == दोष, पिंदार == गर्व/ अहंकार, सनमकदा == मन्दिर)

फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
अर्ज़-ए-मता-ए-अक़्ल-ओ-दिल-ओ-जाँ किये जुए
(तलब == ढूँढ़ना, मता == कीमती सामान)

दौड़े है फिर हर एक गुल-ओ-लाला पर ख़याल
सदगुलसिताँ निगाह का सामाँ किये हुए

फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना
जाँ नज़र-ए-दिलफ़रेबी-ए-उन्वाँ किये हुए
(नामा-ए-दिलदार== प्रेमपत्र, उन्वाँ == उपाधि)

माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख पे परेशाँ किये हुए
(लब-ए-बाम == छत का किनारा, सियाह == काली)

चाहे फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ू
सुर्मे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़्श्गाँ किये हुए
(मुक़ाबिल == बदले में, दश्ना == छुरा)

इक नौबहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
चेहरा फ़ुरोग़-ए-मै से गुलिस्ताँ किये हुए
(नौबहार-ए-नाज़ == प्रियतम, फ़ुरोग़ == प्रकाश/चमक)

फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें
सर ज़ेर बार-ए-मिन्नत-दरबाँ किये हुए
(सर ज़ेर बार == सिर झुकाकर)

जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए
(तसव्वुर == ख़याल)

‘ग़ालिब’ हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किये हुए
(तहय्या == निश्चय)

इक़बाल बानो

मोहम्मद रफ़ी

नूरजहाँ

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2 Responses to मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किये हुए

  1. समीर लाल कहते हैं:

    आनन्द आ गया. उम्दा प्रस्तुति.

  2. parulk कहते हैं:

    वाह !क्या बात है! रफ़ी की आवाज़ ! शुक्रिया

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