दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

रचना: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
स्वर: मेंहदी हसन / बेग़म अख़्तर / नूरजहाँ

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

वीराँ है मैकदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास है
तुम क्या गये के रूठ गये दिन बहार के

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवर-दिगार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

भूले से मुस्कुरा तो दिये थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वल-वले दैल-ए-ना-कर्दाकार के

मेंहदी हसन

बेग़म अख़्तर

नूरजहाँ

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2 Responses to दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

  1. समीर लाल कहते हैं:

    आभार इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिये.

  2. Manish कहते हैं:

    I suggest you to change font size and/or background color. Its uncomfortable to read

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