नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं

रचना: नासिर काज़मी
स्वर: मुन्नी बेग़म / ग़ुलाम अली

नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं
तू भी दिल से उतर न जाय कहीं

आज देखा है तुझको देर के बाद
आज का दिन गुज़र न जाय कहीं

आरज़ू है कि तू यहाँ आये
और फ़िर उम्र भर न जाय कहीं

दिल जलाता हूँ और सोचता हूँ
रायेगाँ ये हुनर न जाय कहीं

न मिला कर उदास लोगों से
हुस्न तेरा बिखर न जाय कहीं

आओ कुछ देर रो ही लें ‘नासिर’
फिर ये दरिया उतर न जाय कहीं

मुन्नी बेग़म

ग़ुलाम अली

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One Response to नीयत-ए-शौक़ भर न जाय कहीं

  1. समीर लाल कहते हैं:

    मजा आ गया, बहुत आभार.

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