मस्त नज़रों से अल्लाह बचाये

स्वर: नुसरत फ़तेह अली ख़ान

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं, हर शब-ए-ग़म की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है, उनकी आग़ोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं
आग को खेल पतंगों ने समझ रखा है, सब को अंजाम का डर हो ये ज़रूरी तो नहीं
शेख़ करता है जो मस्जिद में ख़ुदा को सजदे, उसके सजदों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं
सबकी साक़ी पे नज़र हो ये ज़रूरी है मगर, सब पे साक़ी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं

कोई दिल में लिये अरमान चला जाता है, कोई खोये हुये औसान चला जाता है
हुस्न वालों से ये कह दो के न निकलें बाहर, देखने वालों का ईमान चला जाता है

मस्त नज़रों से अल्लाह बचाये, माहजमालों से अल्लाह बचाये
हर बला सिर पे आ जाये लेकिन, हुस्न वालों से अल्लाह बचाये

इनकी मासूमियत पर न जाना, इनके धोके में हरगिज़ न आना
लूट लेते हैं ये मुस्कुराकर इनकी चालों से अल्लाह बचाये

भोली सूरत है बातें है भोली, मुँह में कुछ है मगर दिल में कुछ है
लाख चेहरा सही चाँद जैसा, दिल के तालों से अल्लाह बचाये

दिल में है ख़्वाहिश-ए-हूर-ओ-जन्नत, और ज़ाहिर में शौक-ए-इबादत
बस हमें शेख जी आप जैसे, अल्लाह वालों से अल्लाह बचाये

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2 Responses to मस्त नज़रों से अल्लाह बचाये

  1. jeetu कहते हैं:

    Kya baat hai….

    Sach me allah bachaye…

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