इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया

रचना: सुदर्शन ‘फ़ाकिर’
स्वर: बेग़म अख़्तर

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया

रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रोलें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें ‘फ़ाकिर’
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने ने दिया

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6 Responses to इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़बात ने रोने न दिया

  1. समीर लाल कहते हैं:

    आभार बेगम अख्तर की इस प्रस्तुति को यहाँ प्रस्तुत करने का.

  2. balkishan कहते हैं:

    बहुत अच्छे.
    आभार.

  3. ranjanabhatia कहते हैं:

    बेहद खूबसूरत गजल यहाँ सुनाने के लिए शुक्रिया ..एक एक शेर इसका दिल को छूने वाला है

  4. anurag arya कहते हैं:

    हमारी fav….गजलों मे से एक रही….अलबत्ता हमने जगजीत चित्रा की आवाज मे सुना ओर बाद मे अपनी दोस्तो की महफ़िल मे खूब गाया…आपने पुराने दिनों की याद दिला दी…..

  5. vikas gupta कहते हैं:

    “ishqme gairte zazabat ne rone na diya.”
    nice creation of a nice person.

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