ख़ुमार बाराबंकवी की कुछ ग़ज़लें…

ख़ुमार बाराबंकवी

हम उन्हें वो हमें भुला बैठे…

ऐसा नहीं के उनसे मुहब्बत नहीं रही…

एक पल में एक सदी का मज़ा हम से पूछिये…

वो हमें जिस कदर आजमाते रहे…

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6 Responses to ख़ुमार बाराबंकवी की कुछ ग़ज़लें…

  1. समीर लाल कहते हैं:

    वाह वाह!! क्या चुन चुन के निकाली ख़ुमार साहेब की गज़लें!! बहुत आभार!!

  2. nirmla कहते हैं:

    वाह ये तो आज सुबह सुबह ही खज़ाना हाथ लग गया बहुत बहुत धन्यवादखिरी गज़ल अच्छी तरह नही सुनी जा सकी आभार्

  3. prithvi कहते हैं:

    क्‍या बात है आपने तो कमाल कर‍ दिया… बधाई

  4. much to like कहते हैं:

    خمار بارہ بنکوئ صاحب کی بات کُچھ اور ہے – بہت بہت شکریہ

  5. amrendra nath tripathi कहते हैं:

    जनाब!
    तीसरी गजल तो बेहद पसंद आयी ..
    ‘ रिश्तों में खुदकुशी ‘ खरी सच्चाई
    है आज के वक़्त की ..
    ,,,,,,,,,,,,,, आभार ……

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