सरफ़रोशी की तमन्ना (गुलाल)

मार्च 27, 2009

हाल में ही प्रदर्शित हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म गुलाल का संगीत काफ़ी प्रभावशाली है। आज के दौर पर कटाक्ष ये छोटा सा छन्द जोकि बिस्मिल के “सरफ़रोशी की तमन्ना” का एक्स्टेंशन है, मुझे बहुत अच्छा लगा। आप भी सुनिये –

ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ
देखते कि मुल्क़ सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गये
अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के तिल में है

आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्ढी भी सिलती इंगलिसों की मिल में है


वैलेन्टाइन्स डे: लव सेना की सुरक्षा में

फ़रवरी 13, 2009

यदि इस वैलेन्टाइन डे पर प्रेमी युगल और प्रेमी एकल राम सेना या अन्य किसी समान विचारधारा के तथाकथित नैतिक मूल्यों के ठेकेदारों से भयभीत होकर अपने प्रेम की बलि देने का मन बना रहे हों तो उनके लिये लिये आशा की एक नयी किरण ले कर आयी है लव सेना। लव सेना आपको वैलेन्टाइन्स डे और जब कभी भी आपको इस प्रकार के किसी खतरे की आशंका होगी, सम्पूर्ण सुरक्षा प्रदान करेगी। यदि आपको लव सेना की काबिलियत पर शक हो तो इतिहास के पन्ने पलट कर देखिये कि किस प्रकार लव और कुश ने अश्वमेघ यज्ञ के दौरान राम सेना का अकेले ही मुकाबला करके उसे पछाड़ दिया था। लव सेना की सुरक्षा में सभी प्रेमी गण निश्चिन्त होकर सन्त वैलेन्टाइन के प्यार के संदेश को विश्व भर में फैला सकते हैं। नफ़रत और बदले की भावना से भरी आज इस दुनिया में आवश्यकता है एक दूसरे से प्रेम करने की और दूसरे के प्रेम को फलता फूलता देख प्रसन्न होने की। लव सेना इसी सोच वाले कुछ कुन्ठामुक्त युवकों का एक समाज सेवी दल है जो आशा करता है कि आने वाले समय में अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ेंगे और इस सोच को विश्व व्यापित करने प्रयत्न करेंगे। आज हमारा समाज कई बुराइयों से ग्रसित है पर उनका निवारण भय से कदापि सम्भव नहीं है। मनुष्य को खूँटे से बाँधकर या कमरे में बन्द करके नहीं बदला जा सकता है आवश्यकता है उसे अच्छे बुरे की समझ प्रदान करने की और फिर यह निर्णय उस पर छोड़ देने की कि क्या सही है और क्या गलत। मनुष्य और पशु में यही अन्तर है।

लव सेना हम सबके मन में उपस्थित है, आवश्यकता है तो बस उसे जगाने की।


मेरी नाज़नीं तुम मुझे भूल जाना

दिसम्बर 19, 2008

स्वर: अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन

मेरी नाज़नीं तुम मुझे भूल जाना, मुझे तुमसे मिलने न देगा ज़माना।

कभी हम मिले थे किसी एक शहर में, कभी हम मिले थे गुलों की डगर में।
समझना कि था ख़्वाब कोई सुहाना, मेरी नाज़नीं तुम मुझे भूल जाना।

जुदाई के सदमों को हँस हँस के सहना, मेरे गीत सुनना तो ख़ामोश रहना।
कभी इनको सुन के न आँसू बहाना, मेरी नाज़नीं तुम मुझे भूल जाना।

सुना है किसी की दुल्हन तुम बनोगी, किसी गैर की अंजुमन तुम बनोगी।
कभी राज़-ए-उल्फ़त लबों पर न लाना, मेरी नाज़नीं तुम मुझे भूल जाना।


एक सपना भारत नवनिर्माण का

नवम्बर 29, 2008
मेरे एक घनिष्ट मित्र हैं। जब भी हम साथ बैठते हैं तो प्रायः एक ज्वलंत समस्या पर विचारों का आदान प्रदान होता है और प्रायः एक हल ढूंढ़ने की कोशिश की जाती है। देश पर आतंकी हमले और उसके बाद नेताओं की आपस में छींटाकशी परसों रात हमें चुभते रहे। सोचा कि क्या इसका कोई हल हमारे या किसी के पास नहीं है। करीब 2 घंटे तक चली बहस के बाद हम इस नतीजे पर कि यदि कोई हल है तो वह है सुनियोजित शिक्षा। यहाँ पर मैं साक्षरता या सिर्फ किताबी पढ़ाई की बात नहीं कर रहा हूँ, आवश्यकता है शिक्षा के माध्यम से लोगों को वैचारिक रूप से समर्थ बनाने की जिससे कि वे अच्छे बुरे की समझ रख सकें। जरूरी नहीं है सभी लोग एक सा सोचें, पर सभी लोग अपनी सोच बनाने में और किसी सोच के साथ चलने का निर्णय लेने में सक्षम होने चाहिये। हमें ऐसे देशवासी चाहिये जो किसी के बहकावे में न आकर सही और गलत का निर्णय ले सकें। अक्सर हम देश की इन समस्याओं के लिये नेताओं को दोषी ठहराते हैं। पर वो भी तो हमारे इसी समाज का अंग हैं यदि नहीं तो ऐसा कौन सा रोग है जो उन्हें नेता बनते ही अपनी चपेट में ले लेता है? खैर अभी के हालात देखकर तो लगता है कि नेताओं को नहीं सुधारा जा सकता। नेता जो भी हों पर उनके बहकावे में आने वालों को यदि शिक्षित किया जा सके तो आने वाली पीढ़ियों के लिये ऐसा माहौल तैयार कर सकते हैं कि उस पीढ़ी के नेता ठीक हों।

हमारी योजना के अनुसार 5000 की जनसंख्या से अधिक वाले सभी गाँवों में एक माध्यमिक विद्यालय और सभी जनपदों में रिहायशी महाविद्यालय खोले जाने की जरूरत है। इस प्रकार से करीब 25 हजार माध्यमिक और करीब 1 हजार महाविद्यालयों खोलने की जरूरत होगी। क्योंकि योजना को इतने बड़े स्तर पर शुरू नहीं किया जा सकता इसलिये हो सकता कि इस स्तर तक आने में इसे 10-15 वर्ष लग जायें। पर उसके बाद की एक पीढ़ी में (25 वर्ष) हम इस माध्यम से 20 करोड़ लोगों को माध्यमिक स्तर तक 1 करोड़ लोगों को महाविद्यालय स्तर की शिक्षा दे चुके होंगे। यहाँ पर गौरतलब बात यह है कि ये सभी 20 करोड़ लोग युवा होंगे और तर्कसंगत सोचने में सक्षम होंगे। किसी भी देश उन्नति के लिये यह एक आधारभूत स्तम्भ है। इन विद्यालय में नयी पीढ़ी का निर्माण कैसे होगा और इनमें ऐसा क्या होगा जिसे देने में आज के सरकारी स्कूल और निजी तथा राजनीतिक संस्थाओं से जुड़े विद्यालय समर्थ नहीं हो पा रहे हैं? सर्वप्रथम हमें आज के युवाओं को यह समझाने की आवश्यकता है कि धर्म, जाति, क्षेत्र इत्यादि सब तुच्छ बातें हैं इनका प्रयोग केवल वास्तविक समस्याओं पर पर्दा डालने के लिये किया जाता रहा है। मुझे नहीं लगता कि बीती सदी में भारत को धर्म से अधिक नुकसान और किसी ने पहुँचाया है। एक बात मैं साफ कर देना चाहता हूँ कि न तो मैं स्वयं नास्तिक हूँ और न ही हमारे इन विद्यालयों में नास्तिकता को प्रोत्साहित किया जायेगा। सिर्फ एक बात यह है कि यदि सभी धर्म हिंसा का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में विरोध करते हैं तो धर्म ही फिर हिंसा का कारण क्यों बनता है। अभी धर्म पर और बातें न करते हुये आगे बढ़ते हैं। इन विद्यालयों के माध्यम से छात्रों को सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक शिक्षा दी जायेगी। विश्व इतिहास में लगभग सभी समस्याओं के इतने उदाहरण हैं कि हमें अब उनसे निपटने के लिये अपने ऊपर प्रयोग करने की कोई आवश्यकता नहीं है। छात्रों को अनुभव प्रदान करने के लिये उन्हें उनके और किसी दूरस्थ गाँव में छुट्टियों में प्रोजेक्ट करने के लिये भेजा जा सकता है, जिससे उन्हें अपने और दूसरे समुदाय के लोगों की भावनाओं और जीवन शैली के बारे में जानने को मिलेगा साथ ही वह दूसरों की भावनाओं को अपनाना सीख पायेगा। भारत एक बड़ा और अपार भिन्नताओं वाला एक देश है। यदि हम लोग इसी तरह से जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर लड़ते रहे तो इसे तोड़ना बहुत आसान हो जायेगा। जरूरत है हमें आपस में एक दूसरे की उपयोगिता और महत्त्व का अहसास कराने की।

इस योजना के कार्यान्वयन में बहुत से धन की आवश्यकता होगी और सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि धन उन्हीं लोगों के पास है जिन्हें लगता है इस योजना के सफल होने से सबसे अधिक नुकसान उनका है। परन्तु वास्तविकता शायद यह नहीं है। भारत आज अपने सामर्थ्य से कहीं कम प्रगतिशील और उत्पादकता में कहीं पीछे है। यदि आज हमारी शक्ति क्षेत्रीय, जातीय, साम्प्रदायिक और राजनैतिक भेद भुलाकर आपस में ही उलझे रहने के बजाय आपस में हाथ बँटाकर कार्य करे तो इसमें सभी का लाभ है। पूँजीपतियों को और अधिक धनालाभ होगा, गरीब भी भूखे नहीं मरेंगे। सभी का जीवन स्तर सुधरेगा और राजनीतिक दल लोगों को आपस में लड़ा कर वोट लेने की कोशिश करने के बजाय कुछ अच्छा काम करके वोट लेने की कोशिश करेंगे।

यही हमारे भारत के नवनिर्माण का सपना है। और यदि भारत को इस सदी में एक विश्व शक्ति बनना है तो निश्चय ही हमें क्षेत्र, जाति और धर्म से ऊपर उठना होगा।


आत्महत्या: दोषी कौन?

जुलाई 10, 2008

एक अरसे से सोच रहा था इस विषय पर लिखने की पर आज अनूप जी के लेख ने उत्प्रेरक का कार्य किया। जब भी हम किसी आत्महत्या की ख़बर सुनते हैं तो सबसे पहले दिवंगत को दोषी ठहरा देते हैं। बेवकूफ़ था, जीवन में एक चीज नहीं मिली तो क्या हुआ जिन्दग़ी इतने पर ख़त्म थोड़े ही हो जाती है। पर शायद इससे कुछ अधिक गहराई चाहिये होती है उस व्यक्ति की मानसिकता समझने के लिये। कुछ समय पहले डेविड ह्यूम की कृति “ऑन सुइसाइड” पढ़ी, लेखक के अनुसार

“I believe that no man ever threw away life while it was worth keeping.”

पिछले 10 वर्षों में दुर्भाग्यवश 7 या 8 ऐसी दुःखद घटनायें मेरे इर्द गिर्द घटित हुयीं। इनमें से कुछ लोगों से मेरा परिचय था और किसी के लिये भी मैं कम से कम उसी को एक मात्र दोषी नहीं मान सकता। कहीं माँ बाप की अतिशय आकांक्षाएं तो कहीं व्यक्तिगत उम्मीदों पर स्वयं या किसी और का ख़रा न उतरना। पर ऐसा नहीं है कि आज से 20 साल पहले ये समस्याएँ नहीं थीं या फिर आत्महत्याएँ नहीं होती थीं। हाँ आज की पीढ़ी की सहनशक्ति अवश्य ही कम हुयी है। कारण एक नहीं कई हो सकते हैं। पहला तो सूचना संचार के इस युग में आप को ये तो पता होता है कि देश दुनिया में क्या हो रहा है पर अपना पड़ोसी किस हाल में है ये नहीं। यहाँ तक कि घर वालों के पास भी समय नहीं बचा है एक दूसरे का सुख दुःख बाँटने का। अपना ही उदाहरण देता हूँ बी टेक के समय हॉस्टल में इन्टरनेट नहीं था तो दिन भर में कैंटीन, मेस, बालकनी पर कम से कम 40-50 लोगों से मिलना होता था और लगभग सभी सहपाठियों की ख़बर रहती थी। पर आजकल मित्र मंडली 5-7 तक सीमित हो गयी है। पिछ्ले महीने एक दिन शाम को बत्ती गुल हुयी तो पता चला कि छात्रावास में आजकल कौन रह रहा है, कई लोगों से तो महीनों बाद मुलाकात हुयी। इन सभी तथ्यों को पिछले 20 सालों में आये सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है। यदि हमने इससे आर्थिक संपन्नता का भोग किया है तो इसके दुश्परिणामों को भी हमें ही झेलना होगा। अभिभावकों को समझना पड़ेगा कि उनका पुत्र या पुत्री सिर्फ़ उनका सोसल स्टेटस सिंबल मात्र नहीं है। मुश्किल परिस्थितियों में हम परिवार जनों और मित्रों का सहारा लेते हैं और इन दोनों की ही अनुपलब्धता में तीसरे विकल्प के चयन में लोगो को अधिक समय नहीं लगता।

पिछ्ले दिनों मैं कानपुर के एक मनोचिकित्सक से इस विषय में बात कर रहा था उनके अनुसार एक बार जब ऐसी घटनाएं शुरू होती हैं तो जैसे चेन रिएक्शन शुरु हो जाती है क्योंकि लोगों को अपनी समस्याओं का एक सम्भावित हल आत्महत्या में दिखने लगता है। कोई कुछ ख़ास कर नहीं सकता इसे रोकने के लिये। इस तरह की घटनायें स्वयं ही कुछ वर्षों में मंद पड़ जाती हैं। अब यदि कोई कुछ नहीं कर सकता इस बारे में तो फिर इस विषय पर लिखने का भी कोई औचित्य नहीं है। यद्यपि मैं मनोचिकित्सक महोदय से पूर्णतया सहमत नहीं हूँ क्योंकि भले ही इस समस्या को सीधे किसी को परामर्श देकर नहीं सुलझाया जा सकता पर यदि इसके मूल तक पहुँचा जा सके तो अवश्य की कुछ सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।
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यह लेख मैंने आई आई टी कानपुर में हुयी दुर्घटनाओं के परिदृश्य में लिखा है। हो सकता है कि अन्यत्र परिस्थितियाँ भिन्न हों।


कुछ चुनिंदा रचनाएँ

अक्टूबर 27, 2007

प्रस्तुत हैं मेरे कविता संग्रह से चुनित कुछ प्रसिद्ध कवियों की कुछ प्रसिद्ध रचनाएँ| आशा है की आप लोगों को ये कुछ सोचने पर मजबूर अवश्य करेंगी|

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार;
पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार|
भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम;
बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम|
लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञानं का श्रम व्यर्थ|
यह मनुज, जो ज्ञान का आगार;
यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार |
छद्म इसकी कल्पना, पाखण्ड इसका ज्ञान;
यह मनुष्य, मनुष्यता का घोरतम अपमान|
– रामधारी सिंह ‘दिनकर’

कहाँ नश्वर जगत में शांति , सृष्टि ही का तात्पर्य अशांति |
जगत अविरत जीवन संग्राम, स्वप्न है यहाँ विराम |
यही तो है असार संसार, सृजन सिंचन संहार |
– सुमित्रा नन्दन पंत

दीप से जलना न सीखो, दीप से मुस्कान सीखो;
सूर्य से ढलना न सीखो, सूर्य से उत्थान सीखो |
अपनी मजबूरी पे, अश्क बहाने वाले राही;
राह चलना ही न सीखो, राह का निर्माण सीखो|
– अज्ञात (यदि आपको पता हो तो अवश्य बताएँ)