…हिमालय की गोद में… – भाग 2

चौथा दिन: मुनश्यारी से चौकोड़ी (लगभग 90 किमी)

बादलों के अधीन मार्ग

बादलों के अधीन मार्ग

सुबह उठे तो देखा कि रात थोड़ी बारिश हुयी है और हवा में भी थोड़ी सिहरन है। समाचार मिला कि टनकपुर तवाघाट राजमार्ग भी कुछ समय के लिये अवरुद्ध रहा। खैर हमें तो उस मार्ग पर अभी दो दिन बाद सफ़र करना था। अगला पड़ाव चौकोड़ी था, जो पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों की सीमा पर स्थित है। जाने का मार्ग थल तक वही था जिससे आये थे उसके बाद बेरीनाग के लिये अलग सकड़ कट जाती है। इस रास्ते में कुछ अलग प्रकार के पहाड़ और चीड़ के सुव्यवस्थित घने जंगल थे। बेरीनाग से करीब 6 किमी पहले चौकोड़ी के लिये रास्ता जाता है जहाँ से ये करीब 3 किमी है। अपराह्न करीब 2 बजे हम लोग चौकोड़ी पहुँचे।
चीड़ के जंगल

चीड़ के जंगल

चौकोड़ी भी एक ठंडी जगह है जो अपने चाय के बगान और हिमालय की चोटियों के दृश्य के लिये प्रसिद्ध है। चाय के बगान तो अब सिर्फ नाम मात्र को रह गये हैं और मौसम की वजह से हिमालय के हिमाच्छादित शिखर भी हमें नहीं दिखे। परन्तु फिर भी बारिश होने की वजह से ठीक ठाक ठंड हो गयी थी। पास ही में एक कस्तूरा मृग (Musk Deer) अनुसंधान केन्द्र है जो शाम को साढ़े तीन बजे तक खुला रहता है। जाने के लिये करीब 2 ढाई किमी का चढ़ाईदार रास्ता है। यह अनुसंधान केन्द्र कम और संरक्षण क्षेत्र अधिक है।
कस्तूरा मृग अनुसंधान केन्द्र जाने का मार्ग

कस्तूरा मृग अनुसंधान केन्द्र जाने का मार्ग

इसमें हिमालय से लाये गये करीब 15 कस्तूरा मृग हैं जिनसे सितम्बर-अक्टूबर में कस्तूरी (Musk) निकाला जाता है। एक नर मृग से एक बार में 10 से 20 ग्राम तक कस्तूरी निकलता है। आजकल मृगों की यह प्रजाति लुप्तप्राय है और हिमालय के बर्फीले इलाकों में कभी कभार ही दिखाई देता है। यहाँ पर फोटोग्राफी निषिद्ध थी इसलिये हमें अपनी आँखों से ही कस्तूरी मृगों को देखकर सन्तुष्ट होना पड़ा। यहाँ पर कुछ देर हमने एक संरक्षक से भी बात की जिन्होंने हमें इन मृगों और उनके रखरखाव के बारे में और कई जानकारियाँ दीं।
चौकोड़ी चाय बगान और पर्यटक आवास गृह

चौकोड़ी चाय बगान और पर्यटक आवास गृह

यहाँ से लौटकर हमलोग बचे खुचे चाय बगान देखने गये। ये चाय बगान अंग्रेजों ने यहाँ लगाये थे परन्तु बहुत कम क्षेत्र में होने के कारण इनका व्यवसायीकरण नहीं हो पाया और आज ये महज एक दर्शनीय स्थल बन कर रह गये हैं। बहरहाल यहाँ से भी घाटी का मनोरम दृश्य देखने को मिलता है। चाय बगान के पीछे देवदार के जंगल हैं जिनके पीछे से घने काले बादल आते देख हमने तुरंत अपने आवास स्थल का रूख किया, फिर भी आते आते बूँदा- बाँदी शुरु हो गयी थी। चौकोड़ी मे स्थित कुमाऊँ मण्डल विकास निगम के गेस्ट हाउस में एक दो मंजिला मचान भी है जहाँ से नजारा लिया जा सकता है। मैने वहाँ जाकर बी एस एन एल के फुल सिग्नल से घर पर बात की। 🙂

पाँचवाँ दिन: चौकोड़ी से लोहाघाट (लगभग 120 किमी)

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर के निकट

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर के निकट

चौकोड़ी से करीब 40 किमी दूर पाताल भुवनेश्वर नामक एक गुफा मन्दिर है। नास्तिकों के लिये भी यहाँ जाना उतना ही रोमांचक और सुखद है जितना कि आस्तिकों के लिये। किंवदन्ती है कि यहाँ पर पाण्डवों ने तपस्या की और कलियुग में आदि शंकराचार्य ने इसे पुनः खोजा। इस गुफा में प्रवेश का एक संकरा रास्ता है जो कि करीब 100 फीट नीचे जाता है। नीचे एक दूसरे से जुड़ी कई गुफायें है जिन पर पानी रिसने के कारण विभिन्न आकृतियाँ बन गयी है जिनकी तुलना वहाँ के पुजारी अनेकों देवी देवताओं से करते हैं।
हाट कालिका मंदिर

हाट कालिका मंदिर

ये गुफायें पानी ने लाइम स्टोन को काटकर बनाईं हैं। गुफाओं के अन्दर प्रकाश की उचित व्यवस्था है। यह संस्‍मारक भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है। यहाँ पर भी फोटोग्राफी मना थी इसलिये केवल प्रकृति के ही फोटो कैमरे में कैद किये। यहाँ से चलकर हमलोग गंगोलीहाट पहुँचे। यहाँ पर प्रसिद्ध हाट कालिका मन्दिर है जो हमारे ड्राइवर की कुल देवी भी हैं। उन्हीं के अनुरोध पर हमलोग यहाँ भी गये। यह मन्दिर कुमाऊँ रेजिमेन्ट का भी मुख्य मन्दिर है, यहाँ पर उनके द्वारा भी स्थापित कुछ स्मारक हैं।
पिथौरागढ़ जाने का पुराना मार्ग

पिथौरागढ़ जाने का पुराना मार्ग

यह भारत भर में स्थित शक्ति पीठों में से एक है और कुमाऊँ मण्डल का सबसे अधिक मान्यता वाला मन्दिर है। गंगोलीहाट से चलकर रामेश्वर होते हुये हमलोग घाट पहुँचे यहाँ से पिथौरागढ़ के लिये रास्ता अलग होता है। ड्राईवर साहब ने हमें पुराना झूलापुल भी दिखाया जिससे पुराने जमाने में लोग पैदल पिथौरागढ़ जाया करते थे। यहाँ से लोहाघाट जाने के लिये वापस हम मुख्य मार्ग (राष्ट्रीय राजमार्ग 125) पर आ गये। रास्ते में काली घटाओं से लुका छिपी खेलते हुये हम लोग शाम करीब 5 बजे लोहाघाट पहुँचे। शाम को लोहाघाट बाजार में कुछ देर घूमे, लंगड़ा आम खाया और कुमाऊँ की प्रसिद्ध बाल मिठाई का भी आनन्द लिया।

छठा दिन: लोहाघाट से खटीमा (लगभग 120 किमी)

बाणासुर के किले से दृश्य

बाणासुर के किले से दृश्य

लोहाघाट में सुबह उठकर सबसे पहले हम लोग बाणासुर के किले पर गये जो यहाँ से खेतीखान मार्ग पर करीब 6 किमी दूर स्थित कर्णकरायत नामक स्थान पर है। किले पर जाने किये डेढ़ किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई है, सुबह सुबह तबियत हरी हो गयी। बाणासुर का उल्लेख महाभारत काल में आता है जिसने श्रीकृष्ण जी के पौत्र का अपहरण करके उसे यहाँ छिपा रखा था। भगवान श्रीकृष्ण ने उसे खोज निकाला और उसके साथ युद्ध करके उसका वध कर दिया। किले के वर्तमान अवशेष 16वीं शताब्दी में चन्द राजाओ द्वारा निर्मित हैं जिन्होने उस समय यह किला मध्यकालीन (9वीं सदी) अवशेषों पर बनाया था।
बिच्छू घास

बिच्छू घास

रास्ते भर मैं अपने साथियों को बता रहा था कि पहाड़ों में एक बिच्छू घास होती है जिसके छूने भर से अत्यधिक खुजली और जलन होने लगती है। यह घास देखने में कैसी लगती है यह मुझे ठीक से याद नहीं था। बाणासुर के किले से उतरकर कार में बैठते समय मेरा हाथ बगल की झाड़ी से स्पर्श मात्र हुआ और पता चल गया कि बिच्छू घास कैसी होती है और इसका दर्द कैसा होता है। यह अनुभव लगभग ततैया (yellow wasp) के काटने जैसा ही था। चालक महोदय ने बताया कि कोई लोहे की चीज रगड़ लीजिये जिससे थोड़ा आराम मिला।
मायावती आश्रम में

मायावती आश्रम में

यहाँ से वापस लोहाघाट लौटकर हमलोग मायावती आश्रम के लिये चल दिये जो कि लोहाघाट से करीब 9 किमी दूर देवदार के जंगलों से ढकी एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ पर राम कृष्ण मिशन का अद्वैत आश्रम और एक मिशन अस्पताल स्थित हैं। स्वामी विवेकानन्द सन 1898 में अपनी हिमालय यात्रा के दौरान यहाँ भी आये थे और उन्होने पत्रिका प्रबुद्ध भारत का प्रकाशन अल्मोड़ा से यहाँ स्थानान्तरित कर दिया।यहाँ पर एक छोटा पुस्तकालय और एक संग्रहालय भी है और पुस्तक भवन है जहाँ से विवेकानन्द साहित्य की पुस्तकें खरीदी भी जा सकती हैं। मायावती से लौटकर हम लोग चम्पावत होते हुये शाम करीब 6 बजे खटीमा वापस पहुँच गये।

सातवाँ दिन: खटीमा से महेंद्रनगर (नेपाल) और वापस (लगभग 50 किमी)

भारत नेपाल सीमा पर आजाद क्षेत्र

भारत नेपाल सीमा पर घास का मैदान

क्योंकि हमारे पास अभी एक दिन और बचा था जो कि हमने बफर के तौर पर रखा था, इसलिये अन्तिम दिन हम लोगों ने पैदल विदेश यात्रा करने का निर्णय लिया। खटीमा टनकपुर मार्ग पर स्थित बनबसा से करीब 15 किमी दूर महेन्द्रनगर स्थित है जो एक समय विदेशी बाजार के कारण आकर्षण का केन्द्र बिन्दु था। मुझे याद है आज से करीब 15 साल पहले लोग वहाँ से जूते, जैकेट, इमरजेन्सी लाइट, जीन्स इत्यादि लाया करते थे। आज वैसे तो सारा सामान भारत में भी उपलब्ध है फिर भी वहाँ जाना एक दिन के लिये एक अच्छी पिकनिक है।
बनबसा डैम का मॉडल

बनबसा डैम का मॉडल

महेन्द्रनगर का रास्ता बनबसा डैम से होकर जाता जो आजादी से कुछ समय पूर्व ही बनना शुरू हुआ था। उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी नहर शारदा नहर यहीं से निकलती है पास में ही लोहियाहेड नामक स्थान पर एक जलविद्युत परियोजना भी है। डैम को पार करते ही भारतीय सीमा समाप्त हो जाती है यहीं पर भारतीय चौकी है। यहाँ से करीब 2 किमी दूर गड्डा चौकी नेपाली चेक पोस्ट है। गड्डा चौकी से महेन्द्रनगर के लिये बस चलती है।
शारदा नहर के किनारे पर थके हुये लोग :)

शारदा नहर के किनारे पर थके हुये लोग 🙂

हमलोग कुछ देर यहाँ के बाज़ार में घूमे, पेट भरा 🙂 और रस्म अदायगी के लिये 15 रुपये का एक नेलकटर खरीद लिया, वैसे नेलकटर के स्वामित्व को लेकर अभी भी हमारे बीच कुछ मतभेद हैं 🙂 । लौटते समय हमलोग गड्डा चौकी से बनबसा (6 किमी) तक पैदल ही आये बीच में डैम पर और फिर नहर के किनारे कुछ देर विश्राम किया। इस दौरान यही चिन्ता हमें खाई जा रही थी कि कल से फिर कानपुर की भीषण गर्मी झेलनी है, यह हमारे चेहरों पर साफ झलक रहा था। 9 दिनों की इस यात्रा में खाने के अतिरिक्त प्रतिव्यक्ति करीब 4 हजार रुपये का खर्च आया जिसे और कम किया जा सकता था। खैर कुल मिलाकर पूरा अनुभव अविस्मरणीय रहा।

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One Response to …हिमालय की गोद में… – भाग 2

  1. समीर लाल कहते हैं:

    आनन्द आ गया तस्वीरें देखकर और पूरा वृतांत पढ़कर.

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